कहानी : दो किलो मूंगफली


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February 15, 2018

-चंद्रशेखर जोशी

“…ज्यादातर लोग ठेले पर ही जा रहे थे। पांच-दस रुपए की मूगफली तौलने तक ग्राहक दो-चार दाने उठाकर खा लेते। यह देख मल्लू का कलेजा मूगफली की माफिक भुन जाता। दिसंबर और जनवरी में बाप-बेटे ने पांच किलो मूगफली जैसे-तैसे बेच डालीं। कुल जमा रुपए उधार चुकाने भर के भी नहीं हुए। घर के लिए आटा-चावल लाना मुश्किल था। सोचा कुछ उधार अगली खेप में चुक्ता हो जाएगा, लिहाजा मल्लू ने पांच किलो मूगफली और लाने की ठान ली।…”

मल्लू बूढ़ा हो गया है। उम्र 45 साल है पर शरीर की कमजोरी 75 के पार। इस बार जाड़ों में दिहाड़ी कमाना दुबले शरीर के बस की बात नहीं थी। सुना था कि सड़क किनारे मूंगफली बेचने वाले अच्छा पैसा कमा लेते हैं। उसने अक्टूबर में ही इस काम की तैयारी कर ली।

…चार जनों का परिवार है। बड़ा बेटा 12 साल का हो गया है। छोटी बेटी स्कूल जाती है। फीस तो नहीं देनी होती पर बांकी सामान खरीदना पड़ता है। पत्नी भी अब बीमार रहती है। दवा में बहुत रुपए लग जाते हैं। मल्लू नवंबर शुरू होते ही पांच किलो मूगफली ले आया। सोचा ये बिक जाएं तो फिर पांच किलो ले आएगा। ठेले वाले परिचित थे, उनसे रेट पूछा तो लगा पांच किलो बिक जाएं तो एक किलो मूंगफली के रुपए बच जाएंगे। भीड़भाड़ वाला शहर है, सोचा अगर मरे दर्जे 10 दिन में पांच किलो भी बिक गए तो महीने में तीन किलो के पैसे मुनाफे के रूप में बच जाएंगे और घर का खर्च चल पड़ेगा। तमन्ना यह भी थी कि पैसे हो गए तो पत्नी को बड़े अस्पताल में दिखाएगा। बच्चों से भी बात-बात पर यही कहता रहा।

…मल्लू अब हर सामान की कीमत मूगफली से ही तय करने लगा। तराजू खरीदने बाजार गया तो होश उड़ गए। सबसे छोटे तराजू की कीमत एक किलो मूगफली के बराबर थी। कुछ रुपए उधार लिए और तराजू भी आ गया। पड़ोस में सब्जी बेचने वाला परिचित था, इसलिए अभी मल्लू ने बांट-माप नहीं खरीदे। शाम को सब्जी वाले से बांट मांगे और पत्थर के टुकड़ों को तौल कर सौ, दो सौ और ढाई सौ ग्राम के बांट बना लिए। मल्लू की हालत देख सब्जी वाले ने घर में पड़ा एक नंबर घिसा आधा किलो का पुराना बांट उसे दे दिया।

…नवंबर अंत में ठंड कम थी. पत्नी की हालत तो ठीक नहीं थी पर दोनों दूर जंगल गए और दो गठ्ठर लकड़ी बीन लाए। कुछ लकड़ी भोजन के चूल्हे में जल गई लेकिन पांच किलो मूगफली भूनने के लिए मोटी लकड़ी बचा ली। दानेदार नमक महंगा लगा तो पहली बार रेत में ही मूगफली भूनने का इरादा किया। रात में मल्लू नदी किनारे से शुद्ध रेता बीन लाया। घर में लोहे की कढ़ाई सब्जी बनाने भर की ही थी। खैर पहली छान आधे किलो की बनाई। पहली बार मूगफली भूनना किसी कारीगरी से कम नहीं। आधी रात तक चारों ने अपना दिमाग लगाया, लेकिन जब चख कर देखा तो मूगफली जलकर कड़वी हो चुकी थी। कोई बात नहीं दोनों बच्चों की मौज आ गई। उनको तो मानो सुगंध ही भा गई। परिवार के लिए ये दाने काजू-बादाम से कम नहीं। मूगफली खाने का मन मल्लू का भी बहुत कर रहा था, पर खा नहीं पाया। एक तो दांत में दर्द और बर्बादी का दुख। लेकिन पत्नी से रहा नहीं गया। उसने दाने निकालकर सिलबट्टे में पीस दिए। इसकी चटपटी चटनी क्या बनाई कि घर में पार्टी हो गई। तीन-चार दिन तक इसी चटनी से रोटियां खाई गई।

…बिना टायरों के सड़े रिम वाला टूटा-फूटा ठेला मल्लू को सस्ते में मिल गया था। पहले दिन सजाकर सड़क किनारे ठेला लगाया। सुबह से रात हो गई, कोई खरीददार नहीं आया। सभी ने सांत्वना दी कि ठंड बढ़ेगी तो मूंगफली खूब बिकेगी। कुछ दिनों बाद एक-दो ग्राहक आने लगे। कोहरा देख मल्लू की समझ में आया कि यदि दो जगहों पर मूगफली बेचने का इंतजाम हो जाए तो काम बन जाए। अगले दिन उसने बेटे को एक बोरा बिछाकर सड़क किनारे बैठा दिया। तराजू एक ही था, इसलिए रात भर 10 और पांच रुपए के पैकेट भी बना लिए गए। कुछ ही दूरी पर मल्लू भी बैठा था। कोहरे में हाड़ कांपते बच्चे का मन कई बार दो दाने खाने को करता पर जैसे ही वह दाने मुंह की ओर ले जाता तोे लगता कि पापा की नजर उसी पर टिकी है। मां की हालत हर पल आंखों पर रहती, वह भी इच्छा दबाए मूगफली बेचने को चिल्लाता रह। दिनभर में दो-चार पैकेट उसके भी बिके पर मुह में एक दाना नहीं डाला।

…ज्यादातर लोग ठेले पर ही जा रहे थे। पांच-दस रुपए की मूगफली तौलने तक ग्राहक दो-चार दाने उठाकर खा लेते। यह देख मल्लू का कलेजा मूगफली की माफिक भुन जाता। दिसंबर और जनवरी में बाप-बेटे ने पांच किलो मूगफली जैसे-तैसे बेच डालीं। कुल जमा रुपए उधार चुकाने भर के भी नहीं हुए। घर के लिए आटा-चावल लाना मुश्किल था। सोचा कुछ उधार अगली खेप में चुक्ता हो जाएगा, लिहाजा मल्लू ने पांच किलो मूगफली और लाने की ठान ली। दिनभर ठेले और कढ़ाई में गिरे मूगफली के दानों को बीनकर चटनी से रोटी खाना परिवार की मजबूरी बन गई। इसमें अब कोई स्वाद नहीं रहा, बस रोटी निगलने का जुगाड़ पक्का हो गया था।

…इस बार कच्ची मूगफली खरीदने बाप-बेटे दोनों गए। मूगफली की कीमत अब बढ़ चुकी थी। दोनों ने राय मसविरा किया और केवल चार किलो ही खरीदी। जेब में फूटी कौड़ी नहीं बची। दूसरे दिन ठेले पर किसी ने मूगफली भी नहीं खरीदी। रोटी तो छोड़ो अब पत्नी की जान बचाने के लिए भी दवा को पैसा नहीं। खैर पत्नी को अपनी जान की कोई परवाह नहीं, वह मूगफली भूनने में मदद करती रही। एक-दो दिन बारिश हो गई, ठेला नहीं लगा। लेकिन मन ही मन पूरा परिवार खुश था। लग रहा था कि अब ठंड बढ़ेगी और मूगफली बिक जाएगी।

…इस बारिश में ठंड तीन दिन ही रही और तेज धूप खिल आई। गुनगुनी धूप पूरे परिवार को काटखाने लगी। ठेले पर कोई ग्राहक फटकने को तैयार नहीं। मन दुखी था। रात में ठेले से बचा माल कमरे के भीतर रखा और बिना उसकी हिफाजत किए सभी लोग सो गए। तड़के नीद खुली तो चूहे आधी मूगफली चट कर चुके थे। जमीन पर छिलकों का ढेर पड़ा था। उठते ही बचे-खुचे माल को तोला तो दो ही किलो मूगफली बची थीं।

…इस बार सर्दी बहुत कम समय तक रही। बाहर आकर देखा तो आसमान साफ था, कुछ ही देर में धूप खिल आई। पूरा परिवार बिना कुछ बात किए मायूस था। मल्लू की पत्नी को अचानक खांसी आने लगी। बहुत कोशिशें कीं लेकिन मानो आज खांसी का दौरा ही पड़ गया। ये खांसी अब जान लेकर रहेगी। दोनों बच्चों को रोता देख मल्लू उदास हो उठा। जेब टटोली खाली थी। बाहर सब्जी वाला दिख गया। बोला भाई साहब मुझे सौ रुपए दे दो. पत्नी का बचना मुश्किल  है, उसे अस्पताल ले जाता हूं. आप बेच देना मेरी ये दो किलो मूगफली।

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