दिल्ली का चिपको आंदोलन


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विनोद पाण्डे
July 13, 2018

बिना वजह पेड़ काटने का निश्चित रूप से विरोध होना चाहिये। पेड़ लगने भी चाहिये और अनावश्यक कटने भी नहीं चाहिये। पर मात्र पेड़ लगाने को या पेड़ बचाने को प्रकृति के प्रति प्रेम का खोखला प्रदर्शन ही कहा जा सकता है, जब तक कि हम अपनी सुविधाओं और विलासिता को त्यागने की शुरूआत नहीं करते।

दिल्ली में 7 सरकारी आवासीय कॉलोनियों के विस्तार के लिये काटे जा रहे पेड़ उस समय सुर्खियों में आ गये, जब कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इन्हें काटने के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया। यह परियोजना क्यांकि केन्द्र सरकार की थी, इसलिए आप और कांग्रेस प्रमुखता से इस आंदोलन में दिखे। देश के लगभग सभी मीडिया चैनलों और अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता दी। बाद में इस आंदोलन में छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हो गये। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस काम पर स्थगन आदेश पारित कर दिया है और राष्ट्रीय हरित अभिकरण ने भी 19 जुलाय तक पेड़ों के काटने पर रोक लगा दी है। भाजपा बचाव में दिख रही है। उसके दिल्ली अध्यक्ष ने तो एक बयान देकर यहां तक कह दिया कि भाजपा ने पिछले साल केवल दिल्ली में ही 2.5 लाख पेड़ लगाये हैं। वह तो भारत सरकार की किस्मत अच्छी थी कि यह काम सरकारी कंपनी राष्ट्रीय भवन निर्माण निगम को दिया गया था, अन्यथा और भी कई और आरोप सरकार पर लग जाते।

प्रथम दृष्ट्या यह आंदोलन पर्यावरण के प्रति लोगों की निष्ठा व समर्पण के रूप में दिखता है। देखकर खुशी होती है कि लोग और मीडिया पर्यावरण के प्रति कितने संवेदनशील हो चुके हैं। पर तब नजर जाती है देश में राजमार्गों को 4 लेन-6 लेन बनाने के लिए काटे जा रहे लाखों पेड़ों पर। हमारे सीमांत क्षेत्रों में ही ऑल वैदर रोड के नाम पर न केवल पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण पेड़ काटे जा रहे हैं बल्कि कई पर्यावरण तंत्र उजड़ रहे हैं। इन रोडों का तमाम मलवा नदियों में समा रहा है। पंचेश्वर बांध तो नदी घाटी के अमूल्य पर्वतीय पर्यावरण को समूल नष्ट करने वाला है। जब इन परियोजनाओं का विरोध किया जाता है तो आंदोलनकारियों को विकास विरोधी घोषित कर कई तरह की तोहमतें लगायी जाती हैं। विकास के नाम पर पर्यावरण तंत्रों को नष्ट करने को जायज ठहरा दिया जाता है। इसलिए प्रश्न उठता है कि जब पहाड़ों में या अन्यत्र परियोजनाओं, जिनमें न केवल वृक्ष बल्कि कई पारिस्थिकीय तंत्र नष्ट होते हैं, का विरोध होता है तो आंदोलन विकास विरोधी होता है तो ‘दिल्ली का चिपको आंदोलन’ विकास विरोधी क्यों नहीं है ? यदि दिल्ली के चिपको वालों की बातों को न्यायालय से लेकर मीडिया तक इतना महत्व दे रहे हैं तो देश में अन्यत्र चल रहे ऐसे आंदोलनां को महत्व क्यों नहीं मिलता ? यदि दिल्ली के आंदोलनकारियों को पर्यावरण के पहरेदार मान कर सम्मान मिलता है तो पंचेश्वर बाँध व ऑल वैदर रोड के आंदोलनकारियों को यह सम्मान क्यों नहीं मिलता ? संक्षेप में यदि हमारे बाँधों, सड़कों आदि के निर्माण को विकास के नाम पर न्यायोचित करार दिया जाता है तो दिल्ली में आवासीय कॉलोनियों के विस्तार को भी विकास परियोजना क्यों न माना जाये ?

इसकी जड़ में केवल एक बात निकल कर आती है कि हमने पर्यावरण की सारी मुसीबतों का हल पेड़ लगाना मान लिया है। वक्त-बेवक्त सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में पेड़ लगाये जाते हैं। हर राजनीतिक-सामाजिक संस्था हर साल पेड़ लगाती है। फिर भी पर्यावरण लगातार बिगड़ ही रहा है। वृक्षारोपण का जुमला लोगों के मानस में इतनी गहरी जड़ें जमा चुका है कि आम जनता में पेड़ के प्रति एक विचित्र किस्म की पवित्र भावना स्वयं ही आ जाती है। थोड़ा इसकी पड़ताल करें। पेड़ों की जरूरत आज इसलिए महसूस की जाने लगी है कि प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। यह सारा प्रदूषण मानवजन्य है। इसके लिए ईंधनचालित वाहन और हमारी बाकी जीवन पद्धति जिम्मेदार है। हमें रहने के लिए बड़े-बड़े घर चाहिये। घर बनाने के लिए जो भी सामान आता है, वह चाहे लकड़ी हो या सीमेंट, टाइलें, ईंट, सरिया, सभी-सीधे सीधे प्रकृति के दोहन से ही आती हैं। यानी ये चीजें पर्यावरण पर सीधा दबाव डालती हैं। स्पष्ट रूप से हमारे आधुनिक बड़े घर बनाने की प्रवृत्ति ही पर्यावरण विरोधी है। हमारे शौचालय ऐसे हो गये हैं कि पेशाब करने भी कई लीटर पानी चाहिये। बिना एसी. के घर अधूरा हो जाता है। बिजली के इतने तरह के इतने तरह के उपयोग होने लगे हैं कि तमाम बांधों के बनने और न्यूक्लियर व तापीय संयंत्रों का उत्पादन भी कम पड़ जाता है और इनसे पैदा होने वाले प्रदूषण की बात दब जाती है। प्लास्टिक हमारी जीवन पद्धति का अभिन्न भाग हो चुका है। हर किसी चीज की पैकिंग प्लास्टिक में होती है। शहर तो शहर, गांव भी प्लास्टिक से पट गये हैं। पर हम इन्हें छोड़ नहीं सकते।

संक्षेप में यह कि हमारी जीवन पद्धति पूरी तरह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली व प्रदूषण पैदा करने वाली है। पर इसका जिक्र नहीं होता। इस जीवन पद्धति के त्याग की बातें लोकप्रियता नहीं पाते। यदि हम प्रदूषण को ही धीरे-धीरे कम करे दें तो जितना कहा जाता है, उतने पेड़ों की शायद जरूरत न पड़े। सिर्फ पेड़ लगाना-बचाना समग्र हल नहीं है। प्रदूषण नियंत्रण का स्थायी हल तो मौजूदा जीवन पद्धति को बदलने से ही आयेगी। पर क्या कारण है कि इस तरह स्व नियंत्रण की बात नहीं की जातीं और पेड़ लगाना एक धर्म की तरह स्वीकार कर लिया गया है ?

कारण साफ है। ऐसा करने से हमारी सुविधाएँ-विलासिताएँ प्रभावित होती हैं। पेड़ लगाने में कोई त्याग नहीं करना पड़ता। बल्कि, यह भी नहीं देखना पड़ता कि पेड़ ठीक से बढ़ भी रहा है या नहीं। पेड़ लगा कर वह एक लावारिस संतान की तरह छोड़ दिया जाता है। बच गया तो ठीक, मर गया तो भी कोई गम नहीं। हम इतने गैर जिम्मेदार हैं कि अपने घर के कूड़े को तक जैविक व अजैविक में बांटकर निस्तारण नहीं करते। दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिये जब ‘ऑड-ईवन’ का प्रयोग, जिसमें सप्ताह में तीन दिन हमें अपने निजी वाहनों का त्याग करना था, शुरू किया गया तो लगभग सभी राजनीतिक दल इसका उपहास करने और विरोध करने खड़े हो गये। इस कार्यक्रम का लोकप्रिय होना तो दूर आज इसका कोई नामलेवा भी नहीं है। यानी विलास करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इससे प्रदूषण हो तो हो। पेड़ हैं न इन्हें पचाने के लिए!

इस सोच की आधारभूत अवधारणा ही गलत है। पेड़ पूरी पारिस्थितिकी या ईको सिस्टम नहीं होता। पेड़ उसका एक नगण्य भाग है, पर अपनी विषालता के कारण यह दिखता है। हमारे कई पारिस्थितिकीय तंत्र ऐसे हैं, जिनमें पेड़ नहीं हैं। जैसे चारागाह तंत्र, समुद्र, नदियों, रेगिस्तान और अन्य जलीय ईको तंत्र। यह सत्य है कि पेड़ कुछ हद तक कार्बन डाई ऑक्साइड को सोख कर आक्सीजन देता है। पर प्रदूषण में तो तमाम प्रकार के पदार्थ हैं। तरह-तरह की ग्रीन हाऊस गैसों, सल्फर, हाइड्रोकार्बन व भारी धातुओं से संबंधित प्रदूषण को खत्म करने में पेड़ों की कोई उपयोगिता नहीं होती। बल्कि इस प्रकार के प्रदूषणों से वे स्वयं भी प्रभावित हो जाते हैं।

जब किसी विकास योजना के नाम पर हजारों पेड़ के काटने की बात होती है तो उनके साथ नष्ट होने वाली घास, झाड़ियों और अन्य छोटे पेड़ों की गिनती नहीं होती। वन अधिनियम में वनौपज की गणना के रूप में पेड़ों को ही माना जाता है। अन्य तो गौण वनोपज कहे जाते हैं। कानूनन केवल पेड़ां का ही नुकसान गणना में आता है। इसके हल के रूप में ‘प्रतिपूरक वृक्षारोपण योजना’ (कैम्पा) के तहत किसी अन्य स्थान पर उतने ही पेड़ लगाने का प्रावधान किया गया है। मगर विकास कार्यों में जो गैर वृक्ष प्रजाति (वनस्पति व जन्तु) नष्ट होते हैं, उनका कुछ नहीं किया जाता। तो क्या यही प्रतिपूर्ति का प्रावधान दिल्ली में कर दिया जाये तो क्षतिपूर्ति हो जायेगी ?

बिना वजह पेड़ काटने का निश्चित रूप से विरोध होना चाहिये। पेड़ लगने भी चाहिये और अनावश्यक कटने भी नहीं चाहिये। पर मात्र पेड़ लगाने को या पेड़ बचाने को प्रकृति के प्रति प्रेम का खोखला प्रदर्शन ही कहा जा सकता है, जब तक कि हम अपनी सुविधाओं और विलासिता को त्यागने की शुरूआत नहीं करते। दिल्ली की भावनाओं और तथ्यों के लिए मीडिया, न्यायालय और जन सामान्य का एक रुख और उत्तराखण्ड जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्य की भावनाओं और तथ्यों के प्रति भिन्न रुख भी हमारे दोहरे चरित्र को उजागर करता है।

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विनोद पाण्डे

प्रकृति और पर्यावरण में विशेष रुचि रखने वाले विनोद पांडे नैनीताल समाचार के प्रबन्ध सम्पादक हैं.