दीवाली और रामराज्य


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विवेकानन्द माथने
November 23, 2018

(महात्मा गांधी कहते थे, ‘स्वराज्य ही रामराज्य है।’ ‘रामराज्य’ सत्य और अहिंसा पर, विश्व धर्म पर आधारित एक नैतिक राज्य की सचित्र व्याख्या है। प्रस्तुत लेख में रामराज्य की संकल्पना उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत की गई है।)

अगर हम ऐसा कहे कि इस कलियुग में हमें ठाठ-बाट के साथ दिवाली मनाने का कोई अधिकार नही है, तो अतिशयोक्ति नही होगी। दिवाली मनाने का अर्थ यह हुआ कि हम रामराज्य में रहने की कल्पना कर रहे है। क्या आज हिंदुस्थानमें रामराज्य है ? जो राजा प्रजा की बात सुनने को तैयार ही नही है, जिस राजाकी प्रजाके लिये पीनेका दूध नही, खानेको भोजन नही, पहननेको वस्त्र नहीं, जो राजा बिना किसी संकोच के लोगों की हत्या करता है, जो राजा अफीम, शराब और गांजेका व्यापार करता है, जो राजा सूअर का मांस खाकर मुसलमानों का और गाय का मांस खाकर हिंदुओं का मन दुखाता है, जो राजा इस्लाम को जोखिममें डालता है, जो राजा घुड़दौड़ में दांव लगाता है उस राजाकी प्रजा दिवाली कैसे मना सकती है ?

इस वर्णन में किसी को अतिशयोक्ति की आशंका नही होनी चाहिये अथवा जिन्हें ऐसा भय है उन्हंे मैं नम्रतापूर्वक समझाने के लिये आतुर हूं। यदि मैं अग्रेजों के प्रति तनिक भी अन्याय करता होऊं तो मैं अपनी भूल स्वीकार करने के लिये तैयार हूं। उस भूलके लिये क्षमा मांगना भी मैं अपना धर्म समझूंगा।

जिस कसौटी पर मै ब्रिटिश राज्य को कसना चाहता हूं उसी कसौटीपर किसी भी भारतीय राजाको कसना चाहूंगा। इतना ही नही अपितु भारतीय राजाको मैं और भी कठिन कसौटी पर कसना चाहूंगा। कसौटी पर थोड़ासा कसते ही मुझे अंग्रेजी राज्य असह्य प्रतीत होता है। इस राज्य सत्ता के प्रति मेरा समस्त मोह नष्ट हो चुका है।

अंग्रेज जनता की शूरवीरता के प्रति मेरे मनमें बहुत अधिक सम्मान है। उनकी संघशक्ति, योजना शक्ति सुंदर है। उनके साहित्य के कितने ही अंश अवर्णनीय है। उनकी ‘बाइबिल’ को पढ़कर मुझे आत्मसंतोष मिलता है। लेकिन उनकी स्वार्थपरता उनके गुणों को ढक देती है। उनकी इस प्रवृत्ति से हिंदुस्थान को नुकसान ही हुआ है। हिंदुस्थान के लोग पतित और कायर हो गये हंै। हिंदुस्थान की जनता मे आज जिस कायरता के दर्शन होते हैं ऐसी कायरता मुगलों अथवा किसी भी राजा के शासनकालमें नहीं थी, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। यह कायरता अनायस ही नही आई है, बल्कि यह जानबूझकर लोगों के दिलोंमें पैदा की गई है। इसी कारण इस राज्य को मै रावणराज्य मानता हूं। हमें जैसा राज्य चाहिये उसे मंै रामराज्य कहता हूं। ऐसा रामराज्य तो स्वराज्य ही हो सकता है।

इस राज्यकी कैसे स्थापना की जा सकती है ? प्राचीन काल में जब जनता कष्ट में होती थी तब वह तपश्चर्या करती थी। प्रजा मानती थी कि पापी राजा उसे अपने पापों के कारण ही मिलता है, इसलिये स्वयं पवित्र होने का प्रयत्न करती थी। उस दिशामें पहला कदम यह होता था कि राक्षस को पहचानकर वह उससे दूर रहती, उससे असहयोग करती थी। असहयोग करने की हिम्मत होनी चाहिये, उसे प्राप्त करने के लिये सुखोपभोगका परित्याग किया जाना चाहिये। राक्षसी राज्य में रहकर शिक्षा प्राप्त करना, उसके हाथों सम्मानित पदवियों को ग्रहण करना, उससे अपने झगड़ों का निर्णय करवाना, उसको कानून रचने में मद करना, उसे सिपाही प्रदान करना, उसके द्वारा तैयार किये गये वस्त्र पहनना और इसके साथ-साथ उस राज्य के नष्ट होने की कामना करना तो जिस डालपर बैठे हो उसी को काटने के समान है। यह तो पाप माना जायेगा और ऐसे राज्यका नाश भी नहीं होगा।
(नवजीवन, 31-10-1920)

महाकवि तुलसीदासने मुझे सीख दी है कि धर्म और अधर्म के बीच किसी भी तरह का सौहार्द, स्नेह या एका नही हो सकता। इसलिये जबतक मेरा विश्वास है कि यह सरकार शैतानी सरकार है और यह कमजोर जातियों के अहंकारपूर्ण शोषणपर खड़ी है, तबतक इससे असहयोग करना मेरा कर्तव्य है और मंै इस मार्ग पर दृढ़ रहूंगा, चाहे मुझे इसपर अकेला ही चलना पड़े। यहां यदि कोई अराजकतावादी हो तो मंै उन्हे बतला देना चाहता हूं कि मै अहिंसापूर्ण असहयोग करना चाहता हूं हिंसापूर्ण नहीं और मेरा असहयोग इस शासन प्रणाली के विरुद्ध है, इस प्रणाली को चलानेवाले व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं।
(खंड 25, 6-12-1924)

इस सरकार को मै राक्षसी क्यों कहता हूं ? क्योंकि उसने निर्बलकी रक्षा करने के लिये नही वरन उनका भक्षण करने के लिये तलवार खींची थी। हमारे स्वराज्य अथवा धर्मराज्य में तो निर्बलकी सेवा करने की भावना ही रहेगी। हम जब शांतिमय स्वराज्य प्राप्त करने के लिये तपश्चर्या करेंगे तभी सच्चे स्वराज्यवादी कहलायेंगे।
(खंड 20, 5-5-1921)

स्वराज्य तो रामराज्य है। यह रामराज्य किस तरह आयेगा, कब आयेगा। हम राज्यको रामराज्य तभी कह सकते है, जब राजा और प्रजा दोनों सरल हो, जब राजा और प्रजा दोनों का हृदय पवित्र हो, जब दोनों त्यागवृत्ति रखते हो, भोगों का सुख उठाते हुये भी संकोच और संयम रखते हों और जब दोनों के बीच पिता और पुत्र जैसे संबंध हो। ..मैने जिस सीधे साधे ढंगसे रामायण को पढ़ा है, उसमें से जो भाव निकलता है, रामचंद्र उसी के अनुसार राज्य करते थे।

..आजका राजा तो राज्य करने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है और प्रजा का किसी प्रकारका अधिकार स्वीकार नही करता। किंतु राजा लोग जिस रामके वंशज कहलाते है, क्या आप जानते हंै कि वह राम किस तरह बरतता था ? आप कृष्ण के भी वंशज कहलाते है। कृष्ण ने कैसा आचरण किया था ? ..ऐसे राज्य में श्वान जैसे किसी जीव को भी दुख नहीं पहुंचाया जाता था, क्योंकि रामचंद्रजी तो जीवमात्र का अंश अपने में देखते थे। ऐसे राज्य में व्यभिचार, पाखंड और असत्य नही रहता। ऐसे सत्ययुग में प्रजातंत्र चलता रहता है। सत्य टूट गया तो राजा राजधर्म का पालन नहीं करता। तब बाहर से आक्रमण होने लगता है। इसी तरह समाजरूपी शरीर के अस्वच्छ हो जानेपर उस समाज के अंगरूप मनुष्यों पर बाहर से आक्रमण शुरू हो जाता है।

किंतु जब राजा और प्रजाके बीच प्रेमका संबंध हो तो प्रजा एक शरीर की तरह आक्रमण का मुकाबला करने में समर्थ रहती है। राज्य शासन तो प्रेमका शासन है। राजदंड का अर्थ पशुबल न होकर प्रेमका बंधन है। राजाने प्रजा को प्रेमपाश से बांध लिया है, इसलिये वह दासानुदास है। ..मै राजा महाराजाओं से कहता हूं कि यदि वे राम कृष्ण के वंशज कहलाने की इच्छा करते हो, तो उन्हे प्रजा का पादप्रहार सहने के लिए तैयार रहना चाहिये। आप प्रजा की गालियां खाईये, प्रजा गैरजिम्मेदार हो सकती है, राजा गैरजिम्मेदार नही हो सकता। यदि राजा बुद्धि खो दे तो पृथ्वी रसातलको चली जाये। ..यथा राजा तथा प्रजा। इसी प्रकार यथा प्रजा तथा राजा। प्रजा बेईमान हो, कायर हो, प्रपंची हो, पाखंडी हो, तो राजा क्या कर सकता है ? संभव है कि राजा अच्छा हो तो बच जाये, किंतु वह प्रजाको तो नहीं बचा सकेगा। यदि प्रजा अपनी स्त्रियों को स्वयं सुरक्षित न रख सके, तो राजा उन्हे सुरक्षित कैसे रख सकता है ?
(खंड 35, 24-1-1928)

स्वराज्य के कितने ही अर्थ क्यों न किये जाये, मंै भी उसके कितने ही अर्थ क्यों न बताता रहा हूं, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है और वह है रामराज्य। यदि किसी को रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मै उसे धर्मराज्य कहूंगा। रामराज्य शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्म पूर्वक किये जायेंगे और लोकमत का हमेशा आदर किया जायेगा। पर रामराज्य के प्राप्ति के लिये सब लोगों को हाथ बंटाना चाहिये। ..सविनय भंग से जो शक्ति बढे़गी उसके शांतिमय और शांतिप्रद होने के कारण, रामराज्य स्थापित करने में उससे हमें बडी मदद मिलेगी। नमक कर के समान और भी अनेक कर है, जो जनता के लिये भाररूप है और जिन्हंे मिटानेका प्रयत्न करने से लोगों को सच्ची शिक्षा मिल सकती है, उनकी शक्ति बढ़ सकती है। ऐसे साधनों से रामराज्य की साधना आसान हो जायेगी। पूर्ण रामराज्य हमें कब मिलेगा, सो तो कोई नही कह सकता लेकिन रातदिन उसी की रट लगाते रहना हमारा सबका धर्म है और सच्चा चिंतन तो वही है, जिसमें रामराज्य के लिये योग्य साधनका भी उपयोग किया गया हों। यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिये हमें पांडित्यकी कोई आवश्यकता नही है। जिस गुण की आवश्यकता है, वह तो सब वर्गों के लोगों स्त्री, पुरुष, बालक और बुढों तथा सब धर्मों के लोगों में आज भी मौजूद है। दुख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी इसकी हस्ती को पहचानते नही हैं। क्या सत्य, अहिंसा, अनुशासन या मर्यादा पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणों का हम में से हरएक व्यक्ति यदि वह चाहे तो आज ही परिचय नही दे सकता ? बात यह है कि हम लोग मायाजाल में फंसे हुये है और इसी कारण अपनी पास की चीजों को पहचान नही रहे है, उलटे दूरकी चीजों को पहचानने का दावा करते है। निसंदेह यह बडे़ शोक की बात है।
(नवजीवन, 20-3-1930)

सत्य और अहिंसा को यदि कुछ समय के लिये कार्य साधकता की दृष्टिसे या मात्र नीति के रूपमें प्रयुक्त किया जाये तो रामराज्य हासिल नहीं किया जा जायेगा। रामराज्य तो तभी हासिल किया जा सकता है जब सत्य और अहिंसा का पालन एक सैद्धांतिक विश्वास के रूपमें किया जाये। क्या कभी कोई पुत्र अपने पुत्रोचित कर्तव्यों का पालन एक नीति के रूपमें कर सकता है ? नीति तो सारतः एक अस्थाई कार्य साधकता ही होती है, जो परिस्थिति बदलने पर बदली जा सकती है। त्याग या कष्ट सहन की नौबत आये बिना सत्य और अहिंसा का पालन करना काफी सरल होता है, लेकिन एक सैद्धांतिक विश्वास के रुपमें इनका पालन करनेवाला तो सभी परिस्थितियों में अपनी जानकी बाजी लगाकर भी अडिग बना रहता है।
(यंग इंडिया, 28-5-1931)

रामराज्य को हम धार्मिक भाषा में धरतीपर ईश्वर का राज्य कह सकते है। राजनीतिक भाषा में इसका मतलब है पूर्ण लोकतंत्र जिसमें अमीर-गरीब, रंग जाति, धर्म और स्त्री-पुरुष का भेद नही माना जाता। ऐसे राज्य में भूमि जनताकी मिल्कियत होती है, राज्य ही जनता का होता है, न्यायमें देर नही लगती, कोई त्रुटि नहीं रहती और उसपर ज्यादा पैसा खर्च नही होता, ईश्वरोपासना और भाषण की स्वतंत्रता होती है, समाचार पत्र स्वतंत्र होते है। यह सबकुछ इसलिये होता है क्योंकि लोग स्वेच्छा नैतिक संयमके नियमका पालन करते है।
(खंड 80, बॉम्बे क्रॉनिकल, 12-6-1945)

रामराज्य में निर्बल से निर्बल व्यक्तिको भी सभी वैसी ही स्वतंत्रता और अधिकार प्राप्त होंगे जैसी स्वतंत्रता और अधिकारों का उपयोग सबल से सबल व्यक्ति करता है। (खंड 82, 13-11946)

ऐसा राज्य सत्य और अहिंसा पर आधारित होगा और उसमें ऐसा गांव और ऐसे लोग होंगे जो समृद्धिशाली और सुखी हों और अपनी जरूरतें आप पूरी कर सकते हांे। रामराज्य एक स्वप्न है जो शायद कभी साकार न हो। मैं उस स्वप्नलोक में विचरने में सुख अनुभव करता हूं और सदा यही प्रयत्न करता हूं कि वह शीघ्रातिशीघ्र साकार हो। (खंड 80, बॉम्बे क्रॉनिकल, 12-6-1945)

मेरी कल्पना का स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नही है, मै धर्मराज्य: धरतीपर स्वर्गका राज्य, जीवनके हर क्षेत्र में सत्य और अहिंसा का राज्य स्थापित हुआ देखना चाहता हूं। वही इस देश के भूखी जनता के लिये स्वतंत्रता होगी। (खंड 80, 20-6-1945)

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विवेकानन्द माथने

'आजादी बचाओ आन्दोलन' और 'सर्व सेवा संघ' से जुड़े विवेकानन्द माथने किसान आन्दोलन से बहुत गहराई से जुड़े हैं.