डरावनी है उत्तराखंड के वनों की तस्वीर


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विनोद पाण्डे
March 26, 2018

हमारे पास वनों की समग्र स्थिति को जानने के लिए इस रिपोर्ट के अलावा और कोई जरिया नहीं है, अतः इसी के आधार पर अपने देश-प्रदेश के हालातों का जायजा ले सकते हैं। इस रिपोर्ट से छन कर आ रही आधी-अधूरी जानकारियाँ ही डराने के लिये पर्याप्त हैं

भारतीय वन सर्वेक्षण भारत के वनों के संबंध में द्विवार्षिक रिपोर्ट जारी करता है। ताजा रिपोर्ट 2017 में जारी की गई है। यह रिपोर्ट उपग्रह से प्राप्त चित्रों के आधार पर तैयार की जाती है। इसके संकलन व व्याख्या में कई त्रुटियां रह जाती हैं। वन सर्वेक्षण विभाग भी दबी जुबान में इस बात को स्वीकार करता है। सर्वेक्षण की प्रस्तावना में ही यह स्पष्टीकरण दिया है कि घने बादलों के कारण पड़ने वाली परछाइयाँ वनों की सघनता का भ्रम दे सकती हैं तो वृक्षारोपण, गन्ने के खेत, फलों के बगीचे, खरपतवार जैसे लैंटाना जैसी झाड़ियाँ भी अगर लंबे क्षेत्र में फैली हों तो वनों के रूप में ही चित्रित हो सकती हैं। इस कारण इस रिपोर्ट को सम्पूर्ण यथार्थ की बजाय एक अनुमान कहना अधिक उचित होगा।

क्योंकि हमारे पास वनों की समग्र स्थिति को जानने के लिए इस रिपोर्ट के अलावा और कोई जरिया नहीं है, अतः इसी के आधार पर अपने देश-प्रदेश के हालातों का जायजा ले सकते हैं। इस रिपोर्ट से छन कर आ रही आधी-अधूरी जानकारियाँ ही डराने के लिये पर्याप्त हैं। सबसे पहले भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा किये गये वनों के वर्गीकरण को जान लें:-

  1. 70 प्रतिशत या अधिक वृक्ष छत्र- अत्यधिक घना वन
  2. 40 से 70 प्रतिशत के बीच का वृक्ष छत्र- सामान्य घना वन
  3. 10 से 40 प्रतिशत के बीच का वृक्ष छत्र- खुला वन
  4. 10 प्रतिशत से कम वृक्ष छत्र- गैर वन

अव्वल तो यह वर्गीकरण ही गलत है, क्योंकि एक स्वस्थ वन का छत्र 70 प्रतिशत से अधिक होना चाहिये और यदि वनों के छत्र का घनत्व 70 से 40 प्रतिशत के मध्य आ गया है तो यह चिंताजनक है और इसे सामान्य कहना उचित नहीं है। इसका नाम अवनत वन होना चाहिये तथा 10 से 40 प्रतिशत के मध्य घनत्व वाले वनों को अति अवनत वन कहा जाना चाहिये। अब देखते हैं कि उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में उपग्रह से प्राप्त ये आंकड़े क्या कह रहे हैं:-

  1. अत्यधिक घना-  4,969 वर्ग किमी. या कुल भूभाग का 9.29 प्रतिशत
  2. सामान्य घना- 12,884 वर्ग किमी. या कुल भूभाग का 24.08 प्रतिशत
  3. खुला वन-  6,442 वर्ग किमी. या कुल भूभाग का 12.04 प्रतिशत
  4. झाड़ी झंखाड़- 383 वर्ग किमी. या कुल भूभाग का  0.71 प्रतिशत
  5. गैर वन- 28,805 वर्ग किमी. या कुल भूभाग का 53.85 प्रतिशत

कुल भू भाग-  53,483 वर्ग किमी.

वन युक्त भू भाग- 46.15 प्रतिशत

आइये, इन आँकड़ों की पड़ताल करें। यदि स्वस्थ से लेकर अवनत वन का क्षेत्रफल जोड़ दें तो यह कुल भूभाग का 45.41 प्रतिशत है। दूसरी ओर जमीन के मिल्कियत के आधार पर वन विभाग के अधीन 38,000 वर्ग किमी. भूभाग है जो कि हमारे कुल प्रादेशिक भूमि का 66 प्रतिशत है। इस 66 प्रतिशत भूमि पर केवल 46 प्रतिशत भाग पर ही वन आच्छादित हैं। अगर हम खुला वन, जिसे मैं अवनत वन कह चुका हूँ, को हटा दें तो हमारे वन केवल 33.37 प्रतिशत पर ही हैं। राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार कुल भूमि के 33 प्रतिशत पर वन होने चाहिये। इस तरह हम ठीक सीमा रेखा पर हैं और हमें बताया जाता है कि उत्तराखंड में बहुत अधिक वन हैं।

इस वन सर्वेक्षण में 2015 के आंकड़ों के साथ भी तुलना की गई है:-

  1. अत्यधिक घना- 165 वर्ग किमी. की वृद्धि
  2. सामान्य घना- 778 वर्ग किमी. की कमी
  3. खुला वन-        636 वर्ग किमी. की वृद्धि
  4. झाड़ी झंखाड़- 87 वर्ग किमी0 की वष्द्धि
  5. गैर वन- 110 वर्ग किमी. की वृद्धि

इस तुलना से पता चलता है कि सामान्य घना वन 778 वर्ग किमी. घट कर 636 किमी. खुले वन में बदल गया और इसी तरह झाड़ी झंखाड़ और गैर वन क्षेत्र भी बढ़ गया है। अर्थात् उत्तराखंड के वनों का एक बड़ा भाग अवनत हो रहा है। इसी रिपोर्ट में अन्यत्र बताया गया है कि आरक्षित वन भूमि 49 किमी. घट गयी है और बाहरी जगहों पर वन 72 वर्ग किमी. बढ़़ गये हैं और इसे प्रचारित भी किया गया है कि हमारे यहां इन दोनों का अंतर यानी 23 वर्ग किमी. जंगल बढ़ गये हैं। मगर ध्यान रखना चाहिये कि ये केवल उपग्रह से प्राप्त चित्र हैं। इनमें बाहरी क्षेत्रों में जो वन बताये जा रहे हैं, वह मात्र हरियाली भी हो सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक वन क्षेत्र पौड़ी गढ़वाल में, 76 वर्ग किमी. बढ़े हैं और नैनीताल में सबसे अधिक, 35 किमी., वन क्षेत्र घटा है। पौड़ी गढ़वाल का अधिकांश वन क्षेत्र चीड़ वनों के मोनोकल्चर से घिरा है। इसलिए यह  बढ़ोतरी चीड़ के प्रसार की ओर ही इशारा करती है और इससे बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है। मगर जनपद नैनीताल में अधिकांशतः चैड़ी पत्ती के वन हैं और इनका घटना निश्चित रूप से चिंताजनक है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपने देश के वनों की जानकारी के लिए हमें उपग्रह के चित्रों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे हमें प्रजातिवार विवरण नहीं मिल पाता। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि जहां कहीं घना वन है, वह चैड़ी पत्ती का उपयोगी वन है या कि चीड़, यूकेलिप्टस, सागौन, पाॅपलर या अकेशिया जैसी पारिस्थिकीय दृष्टि से नुकसानदायक वनस्पतियों का। यह भी हो सकता है कि चित्रों में वन दिखाई देने वाला भूभाग फलों के बगीचे हों। इस तरह ये आंकडे़ यदि विश्वसनीय भी माने जायें तो उनसे वनों की पारिस्थितिकीय उपयोगिता स्पष्ट नहीं होती। हमें वनों के द्वारा प्रदत्त पारिस्थिकीय सेवा की भी जानकारी होनी चाहिये।

इसलिए यह जरूरी है कि उपग्रहों के चित्र के अलावाप्रत्येक वन का जमीनी सर्वेक्षण भी कराया जाये। इसमें केवल छत्र की नहीं, बल्कि जमीनी व मध्यवर्ती पादपों की सघनता भी आंकलित की जाय। पर हमारे प्रदेश में, जहाँ वन विभाग में जबर्दस्त भ्रष्टाचार है, बड़े अफसरों की भरमार हो चुकी है और जमीनी स्तर पर फील्ड कर्मचारियों की भारी कमी है, ऐसा होना सम्भव नहीं लगता। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि उत्तराखंड में अब वन कोई जरूरी मुद्दा नहीं रहे। इसका उदाहरण है कि ‘चिपको’ के नाम पर विश्वविख्यात हो चुके लोगों में से भी वनों की इस अवनति के बारे में अब कोई बयान सुनने को नहीं मिलता।

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विनोद पाण्डे

प्रकृति और पर्यावरण में विशेष रुचि रखने वाले विनोद पांडे नैनीताल समाचार के प्रबन्ध सम्पादक हैं.