गैरसैंण राजधानी समन्वय समिति के संयोजक चारू तिवारी से बातचीत


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व्योमेश जुगरान
April 24, 2018

हम भी ये नहीं कहते कि गैरसैंण बन जाएगा तो सब कुछ बदल जाएगा लेकिन हम यह जरूर कहते हैं कि विकास का रास्ता गैरसैंण से निकल सकता है। हमारे नेता और अधिकारी सुविधाभोगी जगहों पर रहना सीख गए हैं। वे ऊपर नहीं आना चाहते। जिस दिन वे ऊपर आ गए तो पहाड़ की समस्याओं के अनुरूप योजनाओं के बारे में उस ढंग से सोचने का विचार इसलिए भी कर सकते हैं कि यह एक पर्वतीय राज्य है और यहां दस पहाड़ी जिले हैं। पहाड़ की राजधानी पहाड़ में होगी तो एक मानस भी बनेगा कि हम एक पर्वतीय राज्य में रह रहे हैं।

इस साल की शुरुआत से ही गैरसैंण के लिए आंदोलन की तेज आहटें सुनाई दे रही हैं। 26 जनवरी को गैरसैंण में राजधानी संघर्ष समिति के बैनर तले लोग भूखहड़ताल पर बैठ गए। इसी कड़ी में श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, चौखुटिया व अन्य जगहों पर भी अनशन शुरू हुए। दिल्ली व देहरादून में आंदोलनकारियों ने जोरदार प्रदर्शन किए। देहरादून और गैरसैंण में महापंचायतें भी बुलाई गईं। गैरसैंण महापंचायत में समाज का बौद्धिक वर्ग जुटा और दो सौ से अधिक लोग इकट्ठा हुए। इस महापंचायत में तय किया गया कि गैरसैंण आंदोलन को संगठित ढंग से पूरे पहाड़ में फैलाया जाना चाहिए। इसके लिए सर्वसम्मति से फैसला हुआ कि सरकार पर स्‍थानीय संघर्ष समिति का आंदोलनात्मक दबाव बरकरार रखते हुए प्रदेश स्तर एक समन्वय समिति बने जो पूरे पहाड़ का चक्कर लगाए और आंदालन को आगे ले जाए। इसके लिए दो व्य‌क्‍तित्वों का चयन किया गया। नैनीताल समाचार के संपादक और वरिष्ठ आंदोलकारी राजीव लोचन शाह, जिन्हें समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाया गया और हिमालयी जन सरोकारों को समर्पित वरिष्ठ पत्रकार व चिंतक चारू तिवारी, उन्हें संयोजक बनाया गया।

चारू ने एक बातचीत में बताया कि जो आंदोलन चल रहा है, वह गैरसैंण सघर्ष समिति के नेतृत्व में चल रहा है। सबने तय किया है कि आंदोलन को फैलाएंगे। इसके लिए तमाम लागों से बात कर अलग-अलग जगहों पर मिलने का कार्यक्रम तय किया गया है। 7 अप्रैल को हल्द्वानी से इसकी शुरुआत हो चुकी। उन्होंने कहा कि गैरसैंण के आलोक में हम पहाड़ की प्रमुख समस्याओं पर भी जन-जागरूकता चाहते हैं। जैसे, टिहरी-उत्तरकाशी के लोगों को हम गैरसैंण की बात बताना चाहें तो उन्हें उनके स्‍थानीय सवालों से जोड़ना पड़ेगा। इसी तरह पंचेश्वर बांध के सवाल पर पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा हमसे जुड़ते हैं। वहां यह लड़ाई पहले से चल ही रही है। जल-जंगल-जमीन, स्कूल, अस्पताल, पंचायत इत्यादि से जुड़े तमाम सवालों को गैरसैंण के आलोक मे देखते हुए हम वृहद आंदोलन चलाना चाहते हैं। चारू तिवारी ने प्रश्नों के जवाब में पूरे विषय को काफी तार्किक ढंग से सामने रखा-

गरसैंण राजधानी क्यों बननी चाहिए ?

हम प्रतिप्रश्न करना चाहते हैं कि हमारी राजधानी है कहां? हमें राजधानी तो चाहिए। जब उतराखंड के साथ दो अन्य राज्य झारखंड और छत्तीसगढ़ बनें तो उनके प्रारूप में स्पष्ट था कि रांची और रायपुर राजधानी होंगी। हमारे यहां एक लाइन लिखी थी कि जो पहली सरकार आएगी, वह राजधानी का फैसला करेगी। लेकिन उस पहली सरकार ने हमारे ऊपर एक आयोग बैठा दिया। लोगों को लगता था कि चलो दीक्षित आयोग बन गया है, रिपोर्ट गैरसैंण के पक्ष में ही आएगी। लेकिन आठ साल तक सरकारी पैसा चूसते रहे इस आयोग का कार्यकाल लगातार बढ़ाया जाता रहा। अदालती दखल के बाद ही उसे बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ा। सरकार उसकी रिपार्ट सदन में रखने का साहस नहीं कर सकी क्योंकि उसमें कुछ नहीं था। सरकार ने जिस अलोकतांत्रित ढंग यह सब किया, वह पहाड़ के लोगों को चिढ़ाने वाला था। जबकि उत्तराखंड अकेला ऐसा राज्य था जिसने अपनी राजधानी 1992 में ही तय कर ली थी। तब उत्तराखंड क्रांति दल ने वीर चन्द्रसिहं गढ़वाली के नाम पर गैरसैंण का नाम चन्द्रनगर रखा और वहां गढ़वालीजी की प्रतिमा स्‍थापित कर राजधानी का बाकायदा शिलान्यास किया। गढ़वालीजी अलग राज्य के कट्टर समर्थक थे और चाहते थे गैरसैंण राजधानी बनें। हम गढ़वालीजी को आपना आदर्श मानते हैं और उन्हीं के विचार को आगे बढ़ाते हुए गैरसैंण में राजधानी चाहते हैं। गैरसैंण को हम विकास का मॉडल मानते आएं हैं।

लेकिन मुख्यमंत्री तो कह रहे हैं कि गैरसैंण महज एक भावनात्मक मुद्दा है !

हां है। पर, सरकार या मुख्यमंत्री को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और गहराई से समझाना चाहिए कि जनता के लिए यह कितना बड़ा सवाल है। लोगों को लगता था कि राज्य बनेगा तो हमारे सपने पूरे होंगे। पर इन 17 सालों में आकांक्षाओं का पूरा होना तो दूर, बुनियादी सवाल तक नहीं छुए गए। जब हम राज्य आंदोलन लड़ रहे थे तो हमने एक ब्ल्यूप्रिंट बनाया था कि राज्य कैसा होगा, हमारी जमीन, हमारे जंगल, हमारी नदियां कैसी होंगी। कैसे रोजगार सृजन करेंगे, किस ढंग की व्यवस्‍था बनाएंगे। पंचायती राज कैसा होगा, जल विद्युत परियोजनाओं का स्वरूप क्या होगा और यह भी हम अपनी राजधानी कैसी बनाएंगे। गैरसैंण को हमने अपने ढंग से प्रस्तावित किया था। हम इसे उत्तराखंड की भावनाओं के अनुरूप एक ऐसा शहर बनना चाहते थे जिसमें उत्तराखंड राज्य के सारी परिकल्पनाएं समाहित हों। राज्य आंदोलन में हंसा धनाई और बेलमती चौहान जैसी मातृशक्ति सहित 42 शहादतें हुईं। राज्य बना पर जब राजधानी नहीं बनी तो बाबा मोहन उत्तराखंडी ने भी शहादत दी। मैं मानता हूं कि चीजें जनता की भावनाओं से भी जुड़ी हैं।

क्या गैरसैंण राजधानी होने पर विकास होगा ?

हमने कहा है कि गैरसैंण के आलोक में हम पहाड़ की तमाम समस्याओं को देखते हैं। हमने सोचा था कि उत्तराखंड को एक बेहतर राज्य के रूप में बनाएंगे लेकिन 17 साल में वैसा राज्य तो बना नहीं। हम भी ये नहीं कहते कि गैरसैंण बन जाएगा तो सब कुछ बदल जाएगा लेकिन हम यह जरूर कहते हैं कि विकास का रास्ता गैरसैंण से निकल सकता है। हमारे नेता और अधिकारी सुविधाभोगी जगहों पर रहना सीख गए हैं। वे ऊपर नहीं आना चाहते। जिस दिन वे ऊपर आ गए तो पहाड़ की समस्याओं के अनुरूप योजनाओं के बारे में उस ढंग से सोचने का विचार इसलिए भी कर सकते हैं कि यह एक पर्वतीय राज्य है और यहां दस पहाड़ी जिले हैं। पहाड़ की राजधानी पहाड़ में होगी तो एक मानस भी बनेगा कि हम एक पर्वतीय राज्य में रह रहे हैं।

सवाल फिर वही है गैरसैंण को ‘देहरादून’ होने से कैसे बचाएंगे ?

दरअसल शहरों के बनने का भी एक कंसेप्ट होता है। उनके पीछे एक ऐसा विचार काम करता है जो कई बार हमें आगे भी ले जाता है। हमारे यहा सबसे पहले कत्यूरियों का शासन था जो कुमाऊं और गढ़वाल में बराबर रहा। कत्यूरियों ने पहला शहर बसाया, जोशीमठ और दूसरा बैजनाथ। उसके बाद कुमाऊं में चंदो का शासन आया तो उन्होंने चंपावत बसाया। दूसरा शहर उन्होंने अल्मोड़ा, तीसरा बाजपुर और चौथा रुद्रपुर बसाया। गढ़वाल में पंवारों ने श्रीनगर, टिहरी, प्रतापनगर और नरेंद्रनगर बसाया। अंग्रेज आए तो उन्होंने नैनीताल, रानीखेत, लैंसडाउन और मसूरी को बसाया। साथ ही देहरादून का भी विकास किया। इस तरह हमारे यहां अलग-अलग समय में शहरों के निर्माण व विकास की प्रक्रिया चली। इसे आप इस तरह भी समझ सकते हैं कि जो शहर बनें, वो राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से बहुत सपन्‍़न हुए और उनके चारों ओर विकास का रास्ता निकला। ऐसा अन्य शहरों के साथ भी होता है। इसीलिए हम कह रहे हैं कि एक समृद्ध् विकास का रास्ता गैरसैंण से निकल सकता है। हम गैरसैंण को अपने विकास के बड़े फलक पर भी देखते हैं और इसीलिए राजधानी के लिए उसकी वकालत बार-बार करते हैं।

गैरसैंण में सत्र पर ऐतराज क्यों? सत्र से राजधानी की संभावना बलवती होती है।

दरअसल गैरसैंण को खिलौना बना दिया गया है। चाहे भाजपा हो कांग्रेस, दोनों इसे एक गेंद के रूप में इस्तेमाल कर रहे हें। 2012 में जब कांग्रेस की सरकार आई तो मुख्‍यमंत्री विजय बहुगुणा ने सबसे पहले एक सत्र गैरसैंण में लगाया। इसलिए लगाया कि पार्टी में कलह थी। इसके बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री बने तो उनकी भी मजबूरी थी कि वहां सत्र लगाएं। हम लोगों ने बार-बार कहा कि वहां सत्र लगाने का ड्रामा मत करो। तुम्हें सत्र लगाना है तो दिल्ली में लगा दो। सैर-सपाटा करना है तो मुंबई में सत्र लगा दो। पर गैरसैंण को राजधानी घोषित करो। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर ध्यान दो। मगर इन्होंने हमारी बात मानने की बजाय वहां सत्र लगाकर हमारे लोगों को गुमराह करने का काम किया है। अभी आप देखें, इस बार सत्र के दौरान हम लोगों पर डंडे बरसे। आठ नौ हजार लोग वहां प्रदर्शन करने गए तो सरकार ने तीन दिन पहले से पहरा बैठा दिया। जब हमने विधानसभा कूच किया तो हमारी महिलाओं को मारापीटा गया। चलिए ये तो प्रोटेस्ट का हिस्सा है। प्रोटेस्ट करेंगे तो सरकार दमन करेगी। ये हमारे लिए नई बात नहीं है। नई बात और है। वहां दो कैंप फायर लगाए गए। विधायकों और अफसरों के अलग-अलग। वहां शराब चली और मुर्गे चले। रोटी लाने के लिए झगड़ा हुआ। विधायकों के बीच मारपीट हुई। गैरसैंण में अगर यही सब ड्रामा करना हो तो शहीदों का इससे बड़ा अपमान और क्या होगा !

क्या स्‍थानीय लोग आपकी इस मुहिम में साथ हैं?

यह महत्वपूर्ण सवाल है। 1992 में जब क्षेत्रीय ताकतों ने गैरसैंण में राजधानी का शिलान्यास किया तो वहां दस हजार लोग जमा थे। इनमें गैरसैंण का एक भी नहीं था। झामुमो के सूरज मंडल भी आए थे। स्‍थानीय दुकानदार पूछते थे कि ये लोग कौन हैं क्यों आ रहे हैं। इस पूरे दौर में सिर्फ दो स्‍थानीय परिवार हमारे साथ थे। वो भी इसलिए कि वे उक्रांद के कार्यकर्ता थे। इनमें एक धूमादेवी हैं जो बेहद मजबूत महिला हैं और पूरे आंदोलन में हमारे साथ रही हैं। आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि इसबार गैरसैंण का पूरा क्षेत्र हमारे साथ था। इस बार जो भी प्रोटेस्ट हुआ, स्‍थानीय लोगों ने किया। लोगों को भी लगने लगा है कि राजधानी बनेगी तो उनका विकास होगा। लोगों को हम यह समझाने मे सफल रहे हैं कि यह सिर्फ गैरसैंण के विकास का सवाल नहीं है। यह पूरे राज्य का सवाल है। इसलिए आपको इसका समर्थन करना चाहिए। मजेदार बात यह है कि अब तक सरकारें चुप बैठी थीं मगर जैसे ही स्‍थानीय लोग आंदोलन में कूदे तो सरकार ने कहना शुरू किया कि क्षेत्रीय विकास करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि हम यहां झील बनाएगे। सड़कें बनाएंगे। शोध संस्‍थान बनाएंगे।

ग्रीष्मकालीन राजधानी पर सहमति बन सकती है क्या ?

असल में ये बड़ी नासमझी है। हम ये तो नहीं कह रहे कि आज ही राजधानी में बैठ जाओ। हम भी जानते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में वक्त लगता है। एक दिन में तो बनना नहीं है। सरकार एक प्लान बनाकर राजधानी तो घोषित कर ही सकती है। लेकिन कभी मिनी सचिवालय तो कभी शोध संस्‍थान तो कभी ग्रीष्मकालीन राजधानी की बातें हो रही हैं। इसके पीछे गहरी चाल है। ग्रीष्मकालीन राजधानी का विचार एक उपनिवेशवादी सोच है। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां अपने संसाधन बचाने का ही संकट हो, वहां दो-दो राजधानी एक जनविरोधी विचार है। ग्रीष्मकालीन राजधानी हम स्वीकार नहीं कर सकते।

टिहरी-उत्तरकाशी जैसे जिले जो देहरादून के नजदीक हैं गैरसैंण पर उतने मुखर नहीं हैं। मैदानी लोगों का भी सवाल है। इस पूरे आंदोलन में इन लागों के अलगाव को आप किस रूप में देखते हैं ?

सबसे पहले नीचे का सवाल लेते हैं। तराई के जितने विधायक हैं, गैरसैंण के समर्थन में खड़े हैं। विधानसभा अध्यक्ष अग्रवाल जो कि ऋषिकेश से हैं, उन्होंने हम सबके बीच आकर कहा कि व्यक्तिगत रूप से वह गैरसैंण के समर्थक हैं। राजकुमार ठकुराल वगैरह भी पूरी तरह समर्थन में हें। बल्ली सिंह चीमा ने राजधानी पर गीत तक लिखा है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा जिस दिन हमने समिति बनाई, पिथौरागढ़ के सीमांत युवा समिति के लोगों ने गैरसैंण के पक्ष में विशाल प्रदर्शन किया। टिहरी से महिपाल सिंह जैसे आंदोलनकारियों के नेतृत्व में लोग गैरसैंण आए और उन्होंने गढ़वाली गीतों के पोस्टर बनाए और फ्लैक्स भी लगाए।

आंदोलन की राह में क्या-क्या चुनौतियां हैं?

सबसे बड़ी चुनौती ये है कि हमारे पास वह ताकत नहीं है कि फैसला ले सकें। हम नीति-नियंता नहीं हैं। दूसरे, उत्तराखंड आंदोलन में जो छटपटाहट थी, वो गेरसैंण के बारे में अभी तक नहीं है। हालांकि सबके दिल में है कि राजधानी पहाड में बनें। हमें यह सब ठीक करना है। हम लोगों के पास जाएंगे। नई पीढ़ी को राज्य आंदोलन और बलिदानों के बारे में उतनी जानकारी न होना और उन्हें जोड़ना भी एक बड़ी चुनौती है। पर सुखद यह है कि नई पीढ़ी, जिसने राज्य आंदोलन नहीं देखा और उत्तराखंड के इतिहास और संस्कृति का जिसे उतना बोध नहीं है, उसने पहाड़ को नए सिरे से समझने की कोशिश की है। संघर्ष और चेतना नई पीढ़ी को हस्तांतरित करने के लिए हम जैसे बीच के लोग पुल का काम कर रहे हें। हम यदि इस मोर्चे पर छह माह काम कर लें तो हमारा मानना है कि यह स्थिति पहाड़ में वैकल्पिक राजनीति का खालीपन भी भर सकती है।

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व्योमेश जुगरान

मूलतः पौड़ी के रहने वाले व्योमेश जुगरान दिल्ली में नवभारत टाइम्स से सेवानिवृत्त होने के बाद अब फ्रीलान्स पत्रकारिता कर रहे हैं.