बस दुर्घटना का मुद्दा आतंकवाद जैसा बड़ा नहीं बनता


नैनीताल समाचार
July 13, 2018

 

एक जुलाई को धुमाकोट (जनपद पौड़ी) के पास एक भीषण बस दुर्घटना में 48 लोग काल कवलित हो गये। इनमें 22 पुरुष, 16 महिलायें और 10 बच्चे थे। उत्तराखंड में प्रति वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में जितने व्यक्ति मरते हैं, देश भर में कुल मिला कर आतंकवादी घटनाओं में नहीं मरते। परन्तु यह मुद्दा आतंकवाद जैसा बड़ा नहीं बनता। इस बार उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस घटना का स्वतः संज्ञान लेकर प्रदेश सरकार पर दबाव बनाया है। सरकार हरकत में आती दिखाई दे रही है। मगर समस्याओं की जड़ में जाकर उनका समाधान ढूँढने की नीयत होने और दबाव में आकर डंडा घुमाने में फर्क है। पुलिस और ट्रांस्पोर्ट विभाग किस तरह हफ्ता लेकर नियम-कानूनों की अनदेखी करते हैं, यह सड़क मार्गों पर नियमित रूप से यात्रा करने वाला अंधा व्यक्ति भी देख सकता है, आरामदेह निजी गाड़ियों में सफर करने वाले नेता, मंत्री और अधिकारी भले ही न जानते हों। धुमाकोट में दुर्घटनाग्रस्त हुई 28 सीटर बस में कुल 61 व्यक्ति सवार थे। पहाड़ में यह सामान्य बात है। मगर अब यदि बसों की संख्या न बढ़ायी जाये, छोटे-छोटे पहाड़ी मार्गांे पर चलने वाली जीपों के परिचालन में नियंत्रण न किया जाये तो एकाएक सख्ती करने पर तमाम यात्री करेंगे क्या ? हर छोटे बस अड्डे पर यह देखा जा सकता है कि ‘रश आवर्स’ में कोई बस पहुँचती नहीं, सवारियाँ उतर नहीं पातीं कि जाने वाले यात्री खिड़कियों के रास्ते अपना सामान या छोटे बच्चों को उसमें ठूँसने लगते हैं। राज्य परिवहन निगम की इस भीड़ के लिये कोई तैयारी नहीं होती। सार्वजनिक परिवहन एक पूरी तरह उपेक्षित विषय है, जबकि इसे दुरुस्त करना शहरों-कस्बों में बढ़ती ट्रैफिक जाम की समस्या का भी एकमात्र समाधान है। जब व्यक्ति को यह विश्वास रहेगा कि उसे सार्वजनिक परिवहन की सुविधा उपलब्ध है तो जबर्दस्ती निजी वाहन खरीदने की ओर क्यों उन्मुख होगा, जबकि पार्किंग सर्वत्र दुर्लभ है और लोग कानून तोड़ कर मोटर सड़कों पर अपनी गाड़ियाँ खड़ी करने को अभिशप्त हैं।

नैनीताल समाचार