• Today is: Sunday ,Feb 17 ,2019

गंगा की रक्षा के लिए एक और संत का अंत करीब है


नैनीताल समाचार
February 4, 2019

ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के अनशन को आज सौ दिन हो गए हैं, लेकिन सरकार उन्हें भी वैसे ही नजरअंदाज कर रही है जैसे वह अपनी जान देने वाले स्वामी सानंद को करती रही थी

 

राहुल कोटियाल

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आज भी रोज़ जैसी ही हलचल है. जगह-जगह विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं और रंग-बिरंगे झंडे-पोस्टर-बैनर और फ़्लेक्स चौतरफ़ा चस्पा हैं. कई छोटे-बड़े मंच यहां सजे हुए हैं जिन पर सवार वक़्ता अपने साथियों को संबोधित कर रहे हैं. किसी मंच से पुरानी वेतन प्रणाली को फिर से लागू करने की मांग उठ रही है तो कहीं अस्थायी कर्मचारी अपने नियमित होने की मांग को लेकर नारे लगा रहे हैं.

नारों और हुंकारों के इस शोर के बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बिलकुल शांति से बैठे हुए माला जप रहे हैं. रामेश्वर गौड़ ऐसे ही एक व्यक्ति हैं. मूल रूप से हरिद्वार के रहने वाले रामेश्वर बीते तीन दिनों से अपने पूरे परिवार के साथ जंतर-मंतर पर मौजूद हैं. वे गंगा को बचाने की उस मुहिम का हिस्सा बनने यहां पहुंचे हैं जिस मुहिम की कमान इन दिनों ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के हाथों में है.

ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद मातृ सदन से जुड़े एक संत हैं. गंगा की रक्षा के लिए भूख हड़ताल पर बैठे हुए उन्हें सौ दिन पूरे हो चुके हैं. आत्मबोधानंद की यह भूख हड़ताल उन्हीं मांगों को लेकर है जिनके चलते पिछले साल प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने कुल 111 दिनों तक अनशन किया था और जिसका अंत उनकी मौत के साथ ही हुआ था. रामेश्वर गौड़ कहते हैं, ‘प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के बाद अब ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद भी मौत के मुहाने पर खड़े हैं. उन्हें भूखे रहते हुए सौ दिन पूरे हो गए हैं लेकिन, सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही. हम इसी मांग को लेकर दिल्ली आए हैं कि सरकार जल्द-से-जल्द ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद की मांगें पूरी करे और उनका अनशन समाप्त करवाए.’

रामेश्वर गौड़ के साथ ही कई सामाजिक कार्यकर्ता भी ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के समर्थन में जंतर-मंतर पहुचे हैं. मशहूर अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला की पत्नी मधु झुनझुनवाला भी इनमें शामिल हैं. वे बताती हैं, ‘गंगा की रक्षा के लिए कई लोग काम कर रहे हैं लेकिन जितनी कुर्बानियां मातृ सदन गंगा के लिए दे चुका है, शायद ही किसी ने दी हों. स्वामी गोकुलानंद, स्वामी निगमानंद और स्वामी सानंद (प्रो जीडी अग्रवाल) पहले ही अपना बलिदान दे चुके हैं. अब ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद को भी अनशन करते हुए सौ दिन हो चुके हैं लेकिन सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं मिली है.’

मधु आगे कहती हैं, ‘हमारी कोशिश सिर्फ़ यही है कि मातृ सदन के संघर्ष को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचा सकें और देश भर से उनके लिए समर्थन जुटा सकें. कई शहरों में लोग ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के समर्थन में सामने आने भी लगे हैं. हमें उम्मीद है कि यह समर्थन बढ़ेगा तो सरकार को उनकी मांगें माननी ही पड़ेंगी.’

स्वामी आत्मबोधानंद क्या चाहते हैं?

स्वामी आत्मबोधानंद उन्हीं मांगों को लेकर अनशन कर रहे हैं जिनके चलते स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद उर्फ़ प्रो जीडी अग्रवाल ने अनशन करते हुए अपने प्राण त्याग दिए. इनमें मुख्य हैं: गंगा व उसकी धाराओं – अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी, नंदाकिनी, पिंडर और धौली गंगा – पर सभी प्रस्तावित व निर्माणाधीन विद्युत परियोजनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए, गंगा में खनन पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए, गंगा के ऊपरी क्षेत्र में वन कटान प्रतिबंधित किया जाए और गंगा ऐक्ट लागू किया जाए.

बिल्कुल इन्हीं मांगों को लेकर मातृ सदन के संत बीते कई सालों से अनशन करते आ रहे हैं. अब तक कुल तीन संत इन मांगों के लिए अपने प्राण तक त्याग चुके हैं लेकिन किसी भी सरकार ने मातृ सदन की इन मांगों का कभी स्थायी समाधान नहीं किया. खनन और वन कटान पर रोक जैसी कुछ मांगें सरकारों ने समय-समय पर मानी भी, लेकिन ऐसा सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए ही हुआ. मातृ सदन के ब्रह्मचारी दयानंद बताते हैं, ‘अनशन के बाद खनन पर कुछ दिनों की रोक लगती है लेकिन ये फिर से शुरू करवा दिया जाता है. सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, अवैध खनन पर कभी रोक नहीं लगती. लेकिन सरकारें अगर गंगा के लिए हमारे समर्पण की परीक्षा ही लेना चाहती हैं तो हम भी इसके लिए तैयार हैं.’

कौन हैं ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद?

बीते सौ दिनों अनशन कर रहे ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद की उम्र मात्र 26 साल है. मूल रूप से केरल के रहने वाले ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद कम्प्यूटर साइंस के छात्र रहे हैं. 21 साल की उम्र में ही संन्यास लेने के बाद वे मातृ सदन से जुड़ गए थे और इसके बाद उन्होंने अपना जीवन गंगा की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया. मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद बताते हैं, ‘स्वामी सानंद के बाद इस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए आत्मबोधानंद ख़ुद मेरे पास आए और बोले कि ‘चूंकि मैं दक्षिण भारत से हूं इसलिए भी इस लड़ाई को आगे बढ़ाने का यह मौक़ा अब सबसे पहले मुझे दिया जाए, ताकि लोगों को ये न लगे कि गंगा के प्रति सिर्फ़ उत्तर भारत के लोग ही बलिदान कर रहे हैं. गंगा भले ही उत्तर में बहती है लेकिन इसके प्रति पूरे देश में श्रद्धा है और दक्षिण भारतीय लोगों के लिए भी गंगा मां ही है.’

बीते साल 11 अक्टूबर को हुई स्वामी सानंद की मौत के ठीक दस दिन बाद ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने लिखा कि जिन मांगपं के लिए लड़ते हुए स्वामी सानंद ने अपने प्राणों का बलिदान किया, उन्हीं माxगों को लेकर अब वे अनशन करने जा रहे हैं और स्वामी सानंद की लड़ाई जारी रहेगी. ब्रह्मचारी दयानंद बताते हैं, ‘इस पत्र का कोई जवाब हमें प्रधानमंत्री की ओर से नहीं आया. सिर्फ़ ये सूचना मिली कि यह पत्र उत्तराखंड के मुख्य सचिव को भेज दिया गया है. मुख्य सचिव की ओर से भी कोई मातृ सदन नहीं आया.’

यह पत्र लिखने के तीन दिन बाद यानी 24 अक्टूबर से ही ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने अपना अनशन शुरू कर दिया था. बीती 23 जनवरी से वे अपने कुछ अन्य साथियों के साथ इलाहबाद में चल रहे कुंभ में भूख हड़ताल पर बैठे हैं. ब्रह्मचारी दयानंद कहते हैं, ‘मातृ सदन में तय हुआ कि अनशन को विस्तार देने के लिए हम कुंभ में जाकर इसे जारी रखेंगे. यहां गंगा में स्नान के लिए लाखों श्रद्धालु हर रोज़ आते हैं जो गंगा बचाने की हमारी लड़ाई में समर्थन भी कर रहे हैं. लेकिन सरकार की ओर से अब तक भी कोई वार्ता शुरू नहीं हुई है.’

मोदी सरकार से संन्यासियों की नाराज़गी

मौजूदा केंद्र सरकार को लेकर भी मातृ सदन के संन्यासियों में काफ़ी रोष है. स्वामी शिवानंद कहते हैं, ‘वैसे तो हमने देखा है कि जिस भी सरकार ने गंगा की रक्षा का दावा किया वह खोखला निकला. लेकिन मोदी सरकार से हमें कुछ उम्मीद थी और स्वामी सानंद को तो विशेष रूप उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी गंगा के लिए ज़रूर काम करेंगे. लेकिन अपनी मौत से पहले ही उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि उन्होंने ग़लत व्यक्ति से उम्मीद पाल ली है.’

स्वामी सानंद ने अपनी मौत से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो पत्र लिखे थे उन्हें पढ़ कर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने अंतिम दिनों में वे प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रीमंडल से किस दर नाउम्मीद हो चुके थे. अपने अंतिम पत्र में उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखा था, ‘आपने 2014 के चुनाव के लिए वाराणसी से उम्मीदवारी-भाषण में कहा था- ‘मुझे तो मां गंगा जी ने बुलाया है- अब गंगा जी से लेना कुछ नहीं, अब तो बस देना ही है.’ मैंने समझा आप भी हृदय से गंगा जी को मां मानते हैं (जैसा कि मैं स्वयं मानता हूं और 2008 से गंगा जी की अविरलता, उसके नैसर्गिक स्वरुप और गुणों को बचाए रखने के लिए यथाशक्ति प्रयास करता रहा हूं) और मां गंगा जी के नाते आप मुझसे 18 वर्ष छोटे होने से मेरे छोटे भाई हुए.

इसी नाते अपने पहले तीन पत्र आपको छोटा भाई मानते हुए लिख डाले. जुलाई के अंत में ध्यान आया कि भले ही मां गंगा जी ने आपको बड़े प्यार से बुलाया, जिताया और प्रधानमंत्री पद दिलाया पर सत्ता की जद्दोजहद (और शायद मद भी) में मां किसे याद रहेगी- और मां की ही याद नहीं, तो भाई कौन और कैसा. यह भी लगा कि हो सकता है कि मेरे पत्र आपके हाथों तक पहुंचे ही न हों- शासन तंत्र में ही कहीं उलझे पड़ें हों. अतः पांच अगस्त को पुनः आपको एक पत्र अबकी बार आपको छोटा भाई नहीं प्रधानमंत्री संबोधित करते हुए भेजा और आप तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए उसकी एक प्रति बहिन उमा भारती जी के माध्यम से भिजवाई. मुझे पता चला कि वह आपके हाथों और केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक तक पहुंचा है. पर परिणाम? परिणाम, आज तक वही ढाक के तीन पात. कोई अर्थपूर्ण पहल नहीं. गंगा मंत्री गडकरी जी को न गंगा की समझ है, न उनके प्रति आस्था…’

इसी पत्र में उन्होंने आगे लिखा, ‘आज मात्र नींबू पानी लेकर उपवास करते हुए मेरा 101वां दिन है. यदि सरकार को गंगा जी के विषय में कोई पहल करनी थी तो इतना समय पर्याप्त से भी अधिक था. अतः मैंने निर्णय लिया है कि मैं आश्विन शुक्ल प्रतिपदा (9 अक्टूबर 2018) को अंतिम गंगा स्नान कर, जीवन में अंतिम बार जल और यज्ञशेष लेकर जल भी पूर्णतया (मुंह, नाक, ड्रिप, सिरिंज या किसी भी माध्यम से) लेना छोड़ दूंगा और प्राणांत की प्रतीक्षा करूंगा. प्रभु राम जी मेरा संकल्प शीघ्र पूरा करें जिससे मैं शीघ्र उनके दरबार में पहुंच, गंगा जी की अवहेलना करने और उनके हितों को हानि पहुंचाने वालों को समुचित दंड दिलवा सकूं. उनकी अदालत में तो मैं अपनी हत्या का आरोप भी व्यक्तिगत रूप से आप पर लगाऊंगा- अदालत माने न माने.’

यह पत्र लिखने के कुछ दिन बाद ही स्वामी सानंद की मौत हो गई. इस मौत के कुछ घंटे बाद ही प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, ‘श्री जीडी अग्रवालजी के निधन से सदमे में हूं. उनका अध्ययन, शिक्षा, और पर्यावरण विशेषकर गंगा की स्वच्छता के प्रति समर्पण को याद रखा जाएगा. मेरी श्रद्धांजलि.’ आज इसी मातृ सदन का एक और संन्यासी बिलकुल उसी अवस्था में पहुंच चुके हैं जिसमें अपना अंतिम पत्र लिखते हुए स्वामी सानंद पहुंच चुके थे. ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद को भी अनशन करते हुए आज सौ दिन पूरे हो चुके हैं और सरकार उन्हें भी बिलकुल वैसे ही नज़रंदाज़ कर रही है जैसे स्वामी सानंद को करती रही थी.

गंगा की रक्षा के लिए स्वामी सानंद अपनी लड़ाई को जहां छोड़ कर गए थे, मातृ सदन इस लड़ाई को वहां से इतना आगे ले जा चुका है कि एक और संत आज मौत के मुहाने पर खड़ा है. लेकिन सरकार की ओर से इस दिशा में एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ाया गया है. मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद कहते हैं, ‘मोदी जी को न गंगा की फ़िक्र है न गंगा के लिए मरने वाले गंगापुत्रों की. बल्कि बलिदान देने वाले हमारे साथियों की हत्या का दोष भी सीधे-सीधे उनके और उनकी सरकार पर ही है. हमारी ओर से बलिदान देने वालों की न पहले कमी थी न आगे कमी होगी. हम सब एक-एक करके मां गंगा के लिए प्राण दे देंगे. देखते हैं ये सरकार कितनी और हत्याओं से अपने हाथ रंगती है.’

हिन्दी वैब पत्रिका ‘सत्याग्रह’ से साभार

नैनीताल समाचार