यशस्वी किताब ‘तोत्तो-चान’- खुली खिड़की से झांकती लड़की


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अरुण कुकसाल
March 5, 2019

‘तुम सब एक हो, यह पता है ना तुम्हें। तुम कुछ भी करो, इस दुनिया में तुम सब एक साथ हो।’ यही कहते थे श्री कोबायाशी, हमेशा- तेत्सुको कुरोयानागी

विश्वभर में सजृनात्मक शिक्षा पर लिखी किताबों में ‘तोत्तो-चान’ एक विशिष्ट और लोकप्रिय किताब है। अपने प्रथम प्रकाशन वर्ष 1981 में ही 45 लाख प्रतियों की ब्रिकी करके यह किताब जापानी भाषा के प्रकाशन इतिहास का एक शानदार रिकार्ड बना चुकी थी। मूल रूप में जापानी भाषा में लिखी इस किताब के आज की तारीख में विश्व की अधिकतर भाषाओं में अनुवाद छप चुके हैं।

कल की नन्ही तोत्तो-चान सयानी होकर तेत्सुको कुरोयानागी के नाम से जापान में टेलीविजन की महत्वपूर्ण कलाकार है। वह अपने बचपन के ‘तोमोए गाकुएन स्कूल’ के बारे में ढ़ेरों बातें बता कर यह संदेश देती है कि दुनिया का हर बच्चा विशिष्ट है, बस अभिभावकों को उसकी संभावनाओं को समझने की जरूरत है।

तोत्तो-चान किताब तेत्सुको कुरोयानागी के तोमोए स्कूल में बचपन की पढ़ाई के आत्म-संस्मरणों का साहित्यिक प्रवाह है। तोक्यो में रेलगाड़ी के वर्षों पूर्व खराब 6 बोगियों में संचालित तोमोए स्कूल के संस्थापक और संचालक सोसाकु कोबायाशी थे। स्कूली पोशाक और पाठ्यक्रम से इतर यह स्कूल बच्चों को उनकी स्वाभाविकता के साथ निखारता था। वर्ष 1937 से 1945 तक मात्र 8 साल रेलगाड़ी के रुके डिब्बों में इस स्कूल का सफ़र शानदार रहा था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सन् 1945 में तोक्यो पर हुए हवाई हमलों से लगी आग में ‘तोमोए स्कूल’ भी जलकर खाक हो गया था। जिस समय तोमोए जल रहा था कोबायाशी ने अपने दुःख को छुपाते हुए पूरे विश्वास और उत्साह के साथ स्कूल में पढ़ने आये बच्चों से प्रसन्नचित होकर कहा कि ‘अब हम-सब मिलकर इससे भी बेहतर स्कूल बनायेंगे।’ तोत्तो-चान के साथ ही वहां पर रोते हुए अन्य सभी बच्चे अपने हेडमास्टर को देख-सुनकर अवाक् थे। वे आश्चर्यचकित थे कि जीवनभर की सारी पूंजी गंवाने के बाद भी उनके हेडमास्टर प्रफुल्लित होकर भविष्य के प्रति कितने आशावान हैं। अपने हेडमास्टर जी मिली ये प्रेरणा बच्चों के मन-मस्तिष्क में हमेशा के लिए जीवंत रही। इसी का परिणाम था कि तोमोए स्कूल के तमाम बच्चे बाद में जापान की यशस्वी प्रतिभाओं के रूप में देश-दुनिया में विख्यात हुए।

बहुत संक्षिप्त में बात कहूं तो तोत्तो-चान वो बच्ची थी जिसे उसके बचपन के तमाम स्कूलों के अध्यापकों ने पढ़ाने से मना कर दिया था। परन्तु उसकी मां ने धैर्य दिखाया और टोक्यो के कई स्कूलों में कड़ी मेहनत और मिन्नतें करके उसका एड़मिशन कराती रही। तोत्तो-चान समझ ही नहीं पाती थी कि उसे कक्षा के बाहर करके किस बात की सजा दी जाती है। और फिर उसे स्कूल से ही क्यों निकाल दिया जाता है। ऐसे समय में उसकी मां ही उसे संबल देती और कहती कि मैं तुम्हें और बेहतर स्कूल में पढ़ाना चाहती हूं। तोत्तो-चान के उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही उसे अपनी मां से पता चला कि ‘एक बुद्धू और खराब’ लड़की का तगमा उसे उसके अध्यापकों से बचपन में मिला था। जिसे लेकर उसकी मां स्कूल दर स्कूल भटकती फिरती थी। लेकिन मां ने तोत्तो-चान की स्वाभाविकता को कम नहीं होने दिया वरन उसे उभारती रही। मां से मिली यह प्रेरणा तेत्सुको कुरोयानागी जिसका घर का नाम तोत्तो-चान है ने कहा कि ‘सच, मैं सौभाग्यशाली थी कि मुझे ऐसी समझदार और धैर्यवान मां मिली।’

तोमोए स्कूल में अपने हेडमास्टर सोसाकु कोबायाशी का तोत्तो-चान के प्रति हर समय यह प्यारा वाक्य ‘तुम सच में एक अच्छी बच्ची हो’ ने तोत्तो-चान को जीवन भर संबल दिया। बच्चे की सहजता, चंचलता और उसकी प्रसन्नता को आत्मसात करती इस पुस्तक में बच्चों को पढ़ने-पढ़ाने की जगह सीखने-सिखाने के अनुभवों और तरीकों से तोत्तो-चान अपने हेडमास्टर कोबायाशी के साथ पाठकों की ओर मुखातिब हैं।

फिलहाल, किताब के इस अंश पर जरा गौर करें-

‘सैनिक उसके सिर पर हाथ फिराता रहा। उसका रोना थम ही नहीं रहा था। तब शिक्षिका ने गर्मजोशी के साथ संभवतया सैनिक को खुश करने के लिए कहा, ‘अब बच्चे सैनिकों के लिए अपनी-अपनी रचनांए पढ़कर सुनायेंगे।’……..

सैनिक रोया क्यों था यह तो वही जाने। संभव है, ठीक तोत्तो-चान जैसी उसकी भी एक नन्ही सी बेटी हो। यह भी हो सकता है कि तोत्तो-चान के गीत गाने का तरीका उसके मन को छू गया हो। या फिर युद्ध के अनुभव ने ही उसे हिला दिया हो कि कैसे मोर्चे पर सैनिक भुखमरी की स्थिति में पहुंच चुके थे। संभव है, चबाने के गीत ने उसे दुःखद याद दिला दी हो कि खाने को निकट भविष्य में शायद अब कुछ न मिले। या उस सैनिक को शायद यही लगा हो कि इन नन्हे-मुन्ने बच्चों के जीवन पर भी शीघ्र ही युद्ध के बादल गहरा जाने वाले हैं।

अपनी रचनांए पढ़कर सुनाने वाले बच्चों को तब यह पता न था कि प्रशांत महासागर का युद्ध तब प्रारंभ हो गया है। यही नहीं, युद्ध तेजी से फैल भी रहा था।’

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अरुण कुकसाल

अरुण कुकसाल विभिन्न क्षेत्रों में सेवाएँ देने के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृति लेकर अब स्थायी रूप से श्रीनगर में रहते हैं और सामाजिक कार्यों व स्फुट लेखन में व्यस्त हैं.