साल भर बहुमत का ही ढोल पीटती रही त्रिवेन्द्र सरकार


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जय सिंह रावत
March 14, 2018

कोई भी राजनीतिक दल चुनाव में किये गये सभी वायदों को पूरा नहीं करता तो फिर वायदों के प्रति शतप्रतिशत ईमान्दारी की अपेक्षा त्रिवेन्द्र सरकार से ही क्यों की जाय! लेकिन भाजपा ने लोकायुक्त का गठन 100 दिन के अंदर करने के जैसे कुछ समयबद्ध वायदे भी किये थे जिनकी समय सीमा त्रिवेन्द्र सरकार भूल गयी।

उत्तराखण्ड में पहली बार दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर सत्ता में आने वाली त्रिवेन्द्र सिंह रावत की सरकार का पहला साल अपने प्रचण्ड बहुमत का डंका पीटने और कांग्रेस को बुरी तरह पछाड़ने की खुशी के अतिरेक में गुजर गया मगर विशिष्ट परिस्थितियों से घिरे इस पहाड़ी राज्य के लोगों को इस माटी के सपूत त्रिवेन्द्र सिंह रावत से विकास और प्रशासन के मोर्चों पर किसी करामात की अभी भी प्रतीक्षा है। इस स्थिति में मौजूदा भाजपा सरकार के समक्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना लिटमस टेस्ट तो देना ही है लेकिन उससे पहले इसी साल अप्रैल में नगर निका चुनावों में प्रदेश की 30 फीसद आवादी से जनमत हासिल करना भी एक गंभीर चुनौती होगी।

कोई भी राजनीतिक दल चुनाव में किये गये सभी वायदों को पूरा नहीं करता तो फिर वायदों के प्रति शतप्रतिशत ईमान्दारी की अपेक्षा त्रिवेन्द्र सरकार से ही क्यों की जाय! वैसे भी वायदे पांच साल के लिये होते हैं और अभी तो एक ही साल गुजरा है। लेकिन भाजपा ने लोकायुक्त का गठन 100 दिन के अंदर करने के जैसे कुछ समयबद्ध वायदे भी किये थे जिनकी समय सीमा त्रिवेन्द्र सरकार भूल गयी। वायदे के 100 दिन तो रहे दूर अब तो साल गुजर गया मगर लोकायुक्त अभी विधानसभा में ही फंसा हुआ है। त्रिवेन्द्र सरकार ने तबादला कानून पर वायदा निभा कर अपनी जितनी विश्वसनीयता बढ़ाई थी उतनी ही लोकायुक्त मामले ने घटा भी दी। इसी तरह मौजूदा सरकार ने सत्ता में आते ही राज्य में डाक्टरों की कमी पूरी करने के लिये सेना के सेवानिवृत डाक्टरों को अनुबंध पर लेने और श्रीनगर मेडिकल कालेज को सेना के सुपुर्द करने की घोषणा की थी। लेकिन सेना ने राज्य सरकार का यह अनुरोध भी ठुकरा दिया। इसी वर्ष 2018 में उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय खेलों का आयोजन होना था मगर सुविधाओं के अभाव में राज्य से यह अवसर भी छिन गया। सरकार ने जल निगम-जल संस्थान, कृषि एवं बागवानी जैसे समान प्रवृत्ति वाले विभागों का एकीकरण करने का निर्णय लिया था जो पूरा नहीं हो सका। पहाड़ों में छोटी-‘छोटी बिखरी जोतों को एक जगह पर लाने के लिये चकबंदी का निर्णय लिया था, और उस पर भी अभी एक्शन होना बाकी है। सरकार ने देहरादून की रिस्पना नदी को पुनर्जीवित करने की घोषणा की है लेकिन उसमें पानी कहां से आयेगा, यह सवाल मुंहबायें खड़ा है।

मौजूदा सरकार ने निश्चित रूप से गत वर्ष अपनी पारी की शुरूआत कुछ अच्छी पहलों से की थी। इनमें से एक पहल पहाड़ी क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन को रोकने के लिये ग्रामीण विकास और पलायन आयोग के गठन की पहल भी एक है। उत्तराखण्ड में हो रहा पलायन राज्य की ज्वलंत समस्या होने के साथ ही सुरक्षा कारणों से एक राष्ट्रीय चुनौती भी बन गयी है। चार धाम ऑल वेदर रोड को त्रिवेन्द्र सरकार की टोपी में एक नया पंख माना जा सकता है। यद्यपि सड़क चौड़ी करने के लिये जिस तरह बड़े पैमाने पर पेड़ों और पहाड़ को काटा जा रहा है उससे खतरनाक परिणाम आने की संभावना भी पैदा हो रही है। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ स्थानो ंपर टेलिमेडिसिन और टेलि रेडियोलाजी की व्यवस्था की जा रही है। केदारनाथ में पुनर्निर्माण का कार्य पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी अच्छा चला था। लेकिन इस सरकार के कार्यकाल में केदारनाथ में और भी अच्छा काम चल रहा है और स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कार्य की मॉनीटरिंग कर रहे हैं।

त्रिवेन्द्र सरकार के एक साल के कार्यकाल में कोई भी बड़ा घोटाला सामने न आना भी इस सरकार की उपलब्धि ही मानी जायेगी। जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-74 का भूमि मुआवजा घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, शिक्षक भर्ती और छात्रवष्त्ति आदि घोटालों की जांच और राजमार्ग घोटाले में पी.सी.एस अधिकारियों समेत 15 अफसरों पर कार्यवाही सरकार के दष्ढ़ निश्चय का संकेत तो देते हैं लेकिन केवल निशाना विपक्षी कांग्रेस और छोटे अफसरों पर होने तथा तत्कालीन जिलाधिकारी को जांच के दायरे से बाहर कर उसे महत्वपूर्ण पद पर बिठा देने के कारण सरकार की नीयत पर ऊंगलियां भी उठ रही हैं। पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान भाजपा ने घोटालों के कई मामले उठा कर सदन से लेकर सड़क तक कोहराम मचाया था लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा ने उन घोटालों पर चुप्पी इसलिये साध ली क्योंकि जिन कांग्रेस नेताओं पर आरोप लगे थे वे अब भाजपा में है। इन पुराने घोटालों के बारे में चुप्पी से विपक्ष, सरकार की ‘‘जीरो टालरेंस’’ की खिल्ली उड़ा रहा है।

त्रिवेन्द्र सरकार का विकास के मोर्चे पर खाली हाथ रहने का एक कारण अनुभव की कमी तो हो सकता है मगर वास्तव में सरकार की लाचारी का सबसे बड़ा कारण राज्य की दयनीय माली हालत है। चालू वित्तीय वर्ष के आंकड़ों पर ही गौर करें तो बजट में राज्य के करों से कुल 13780.27 करोड़ रुपये, केन्द्रीय करों से राज्य के हिस्से के 7113.47 करोड़ और करेत्तर श्रोतों से 2468.71 करोड़ रुपये का राजस्व मिला कर कुल 23362.45 करोड़ का राजस्व आंकलित किया गया था। जबकि सरकार को ऋणों के ब्याज की अदायगी पर 4409.95 करोड़, ऋणों के प्रतिदान पर 2640.23 करोड़, वेतन भत्तों आदि पर 11044.44 करोड़, सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों के वेतन भत्तों पर 815.09 करोड़, पेंशन एवं अन्य सेवानिवष्तिक लाभों के रूप में 4272.28 करोड़  और कुल मिला कर 23181.99 करोड रुपये बतायी गयी थी। राज्य सरकार जनवरी तक अपने कर्मचारियों को वेतन-भत्ते देने आदि खर्चे चलाने के लिये लगभग 5700 करोड़ का कर्ज ले चुकी है और कर्ज का यह बोझ मार्च तक 6 हजार करोड़ पार करने जा रहा है। जाहिर है कि सरकार की आंकलित आमदनी 23362.45 करोड़ होने के बजाय 18 हजार करोड़ भी नहीं हो पायी। प्रदेश की माली हालत पहले से ही बेहद पतली थी और ऊपर से नोटबंदी तथा जीएसटी ने राज्य की आय के श्रोत और अधिक पतले कर दिये हैं। जब वसूली ही नहीं होगी तो सरकार की तिजोरी कैसे भरेगी? वित्तीय प्रबंधकों की चिन्ता का विषय यह है कि इस साल राज्य इतना कर्ज लेने के बाद भी अशासकीय कालेजों के प्रवक्ताओं और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों तथा पेयजल कर्मचारियों को तीन महीनों से तथा स्वास्थ्य विभाग एवं आइ टी आइ में कार्यरत उपनल कर्मचारियों को कई महीनों से वेतन नहीं मिला। शासकीय कालेजों में चार महीनों बाद बजट रिलीज हुआ। परिवहन निगम के कर्मचारियों को वेतन एक महीने विलम्ब से मिल रहा है।

अगर सरकार इसी गति से अपने खर्च चलाने के लिये कर्ज लेती रही तो यह अब तक की सरकारों में सबसे बड़ी कर्जखोर होने की तोहमत मोल ले लेगी। क्योंकि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि तिवारी सरकार ने 2002 से लेकर 2007 तक कुल 6476.95 करोड़, खण्डूड़ी और निशंक की भाजपा सरकारों ने 2007 से लेकर 2012 तक 10536.33 करोड़ और फिर विजय बहुगुणा और हरीश रावत की कांग्रेस सरकारो ंने 2012 से लेकर 2017 तक 23074.59 करोड़ के ऋण लिये थे। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तराखण्ड की वर्तमान और भावी सरकारें चाहे जितनी भी घोषणाएं कर डालें मगर विकास के नाम पर एक पत्थर रखने की भी उनकी वित्तीय हैसियत नहीं होगी और न केवल विकास कार्यों के लिये वरन अन्य खर्चों के लिये भी उत्तराखण्ड का कटोरा हर वक्त दिल्ली दरबार की चौखट पर रहेगा।

विडम्बना ऐसी कि एक तरफ तो सरकार के पास कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं और दूसरी तरफ चालू वित्तीय वर्ष का बजट ही खर्च नहीं हो पा रहा है। प्रदेश के सरकारी महकमें गत जनवरी तक लगभग 40 हजार करोड़ के वार्षिक बजट में से केवल 26 हजार करोड़ की राशि ही खर्च कर पाये। खर्च हुयी इस राशि में भी वेतन आदि गैर योजनागत खर्चों के लिये जुटाई गयी 5700 करोड़ के कर्ज की राशि भी शामिल है। सरकार लगभग हर महीने 500 करोड़ से अधिक की रकम वेतन और भत्तों आदि के लिये कर्ज ले रही है। इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस साल विकास के नाम पर केवल वेतन भत्ते आदि मदों में ही धन खर्च हो पाया। अगर विकास कार्यों के लिये धन बचा होता तो न तो पीडब्लुडी के ठेकेदार अपने भुगतान के लिये आन्दोलन करते और ना ही प्रकाश पाण्डे जैसे ट्रांस्पोर्टर भाजपा प्रदेश मुख्यालय पर आत्महत्या करते।

 

 

 

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जय सिंह रावत

देहरादून निवासी 63 वर्षीय जय सिंह रावत अनेक अखबारों में काम कर चुकने के बाद अब स्वतंत्र पत्रकारिता और स्फुट लेखन कर रहे हैं. 'स्वाधीनता आन्दोलन में उत्तराखंड की पत्रकारिता' उनके द्वारा लिखित एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है.