अश्वत्थामा हतो हतो


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पृथ्वी 'लक्ष्मी' राज सिंह
May 10, 2018

हमारा पडोसी बिल्ली समझकर तेंदुए का बच्चा उठाने दौड गया।एक बार स्कूली छोकरे सांप का बच्चा कहकर पिट वाइपर को प्लास्टिक की बोतल में भर लाए। अज्ञानतावश ऐसा अक्सर हो जाता है, आप हंसी का पात्र बन जाते हैं। आपने मगरमच्छ का बच्चा पकड लिया, चायवाला कह दिया, नीच कहने की मुनादी करवा दी, इनके फायदे केवल राजनीति में हैं…

दरअसल भारत में सीधे सरकार चलाना आसान बात नहीं है। इसके खतरनाक साइड इफेक्ट होते हैं। राम को सीता का त्याग करना पडा, इन्दिरा, राजीव को जान गंवानी पडी। अब भरत को देखो, राजगद्दी मिल गयी पर वह पैदल चित्रकूट तक राम के पीछे पीछे आ गए। सीधा शासन नहीं किया, खडांऊ रख कर चलाया। राममंदिर मुद्दे के बाद जब कांग्रेस को मौका मिला तो उसने सबक लिया सोनिया ने सीधे शासन न कर के मनमोहन सिंह को रखकर सरकार चला दी। यह इतिहास से सीखने की बात थी।

अटल बिहारी वाजपेयी यहीं चुक गये। जनता पार्टी सरकार को सत्ता का अनुभव मान बैठे। पहले तेरह दिन, फिर तेरह महीने कर करा के अंततः अटल बिहारी वाजपेयी ने पांच साल सरकार तो चलाई।पर वह भानुमति से भी बडा कुनबा था। यह एनडीए नामक ऐसा राजनीतिक परिवार था जिसका डीएनए आपस में कतई मेल नहीं खाता था। बाबरी मस्जिद तोडे जाने पर जिसने कारसेवकों को मिठी घुडकी देकर “बंदरों” भर कहा, उसी अटल बिहारी वाजपेयी से इन घटक दलों ने भरे मंच में गुजरात के सिपहसालार मोदी को राजधर्म सिखवा दिया। ऐसा तो महाभारत में भीष्म पितामह ने तक नहीं किया था। अपनी विनम्रता से अटल इस सरकार को तो निभा गये, पर उनके घुटने जवाब दे गये, मुडने से मुकर गये। प्रधानमंत्री का पद, उसकी गरिमा तक चढने से इनकार करने लगे। यह गठबंधन सरकार का भय ही था कि उनके वारिस आडवाणी ने ऐसी किसी एनडीए सरकार से बेहतर पीएम वेटिंग रहना समझा।

हमारा पडोसी बिल्ली समझकर तेंदुए का बच्चा उठाने दौड गया।एक बार स्कूली छोकरे सांप का बच्चा कहकर पिट वाइपर को प्लास्टिक की बोतल में भर लाए। अज्ञानतावश ऐसा अक्सर हो जाता है, आप हंसी का पात्र बन जाते हैं। आपने मगरमच्छ का बच्चा पकड लिया, चायवाला कह दिया, नीच कहने की मुनादी करवा दी, इनके फायदे केवल राजनीति में हैं।

महाभारत में देखो बन्दे को खुद के बारे में सब पता है, कुन्ती को भी पता है, लेकिन वह सुतपुत्र का ठप्पा लगाये घुम रहा है क्यों! क्योंकि उसे पता है कि सत्ता का रास्ता दुर्योधन से होकर जाता है।

यही राजनीति है। यह किसी चाणक्य नीति या मनुस्मृति में नहीं लिखा है, वह तो आमलोगों में शासन का भय बनाये रखने के लिए है। इतिहास को जनता के लिए तोडा मरोडा जाता है, मंच से आपके सामने इस तरह पेश किया जाता है कि इतिहासकार शर्मिंदा हो जाए, पर मजाल की नेता के चेहरे में सिकन भर भी आ जाए। वह आराम से “अश्वत्थामा हतो” कह देता है, फिर आप बजाते रहो शंख, चिल्लाते रहो “नरो वा कुंजरो वा” कोई फर्क नहीं पड़ता।

विरोधियों ने भले ही कवच कुण्डल जैसा चमकीला लाखों रूपए का विशिष्ट सूट बूट खुरच खुरच कर आपके शरीर से उतार कर नीलाम करवा दिया पर मोदी शासक का इतिहास जानते हैं, उन्होंने खुद को फकीर कह दिया, माँ गंगा का बेटा बता दिया, कुर्सी में बैठे रहे पर खुद को प्रधानमंत्री कभी नहीं कहा, चौकीदार कह दिया। कि भाइयो! भैनो! यह खडांऊ आपकी है। मैं गद्दी में नहीं आपकी खडांऊ में बैठा हूँ! बैठा रहूंगा।
राजनाथ सिंह में भी यह गुण है वह भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं भले ही कुछ हो जाए बस कडी निन्दा कह कर निकल लेते हैं। बीच में नायडू की तबीयत भी थोडा नासाज लग रही थी, उपराष्ट्रपति बनने के बाद अब थोडा ठीक लग रहे हैं।

सुषमा स्वराज राजघाट में ठुमका तो लगा लेती हैं पर सत्ता का मोह है, पसंदीदा मंत्री पद का राजहठ है। यही जेटली में भी है, जनता चुनाव हरवा रही है, रोक रही है पर नहीं सरकार में घुसे जा रहे हैं। अंदर राजनीति बदल रही है, बाहर ग्लोबल वार्मिंग है। ऐसे ही बीमारियां भी बदल रही हैं। टखने से किडनी तक आ गई हैं।

अब सरकार है तो फैसले लेगी ही। पाकिस्तान में विदेश नीति के तहत सर्जिकल स्ट्राइक होती है, देश में वेश्यावृति रोकने के लिए नोटबंदी होती है, व्यापार में जीएसटी लगती है। इधर सरकार फैसले लेगी तो उधर जनता का दबाव पडना ही पडना है। अब प्रधानमंत्री पर तो दबाव है नहीं, वह चौकीदार हैं, निर्विकार हैं। ऐसे में बचे आप आपकी किडनी तो खराब होनी ही होनी हैं।

 

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पृथ्वी 'लक्ष्मी' राज सिंह