और अब ‘पेड फिल्म’


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राजीव लोचन साह
February 1, 2019

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2004 के लोकसभा चुनाव में ‘पेड न्यूज’ शब्द से परिचय हुआ था, जब अखबारों में राजनैतिक पार्टियों की प्रचार सामग्री को इस तरह छापा जाने लगा, मानो वे छान बीन कर बनाई गई शुद्ध खबरें हों और भोला-भाला पाठक उस पर विश्वास करने लगे। यह विचार कहाँ से उपजा, यह बात साफ नहीं हुई। भाजपा उस बार ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे की आक्रामक मार्केटिंग के बावजूद सत्ता से बाहर हो गई थी। काफी कोशिशों के बावजूद ‘पेड न्यूज’ पर अंकुश लगाने में कोई सफलता नहीं मिली। अब तो ‘पेड न्यूज’ आम बात हो गई है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की सफलता में काॅरपोरेट लाॅबी की मार्केटिंग के साथ सोशल मीडिया के भी जबर्दस्त इस्तेमाल का हाथ था। इस हमले से सँभलने में अन्य पार्टियों को बहुत ज्यादा वक्त लगा। अब तो खैर हर पार्टी के अपने-अपने मजबूत आई.टी. सेल हैं, हालाँकि अभी भी वे भाजपा से काफी पीछे हैं। इसीलिये पहले की सरकारों से हर पाँच साल में जनता का जो मोहभंग हो जाता था, आई.टी. में पकड़ के कारण विपरीत जमीनी सच्चाई के बावजूद इस बार वह नहीं दिखाई दे रहा है। इस बार चुनाव से ठीक पहले जिस तरह से ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, ‘उरी’ या ‘ठाकरे’ जैसी फिल्में आ रही हैं, उससे लग रहा है कि अब ‘पेड फिल्मों’ का दौर शुरू हो गया है। 50-60 करोड़ में बनने वाली फिल्मों की पूरी या आधी लागत यदि कोई पार्टी देने को तैयार हो जाये, तो किसी निर्माता को किसी विषय विशेष पर फिल्म बनाने से भला क्या ऐतराज हो सकता है ? ‘उरी’ को देखने पर यह बात विशेष रूप महसूस होती है। निस्संदेह यह एक ठीकठाक युद्ध फिल्म है। मगर इसके कुछ चरित्रों के चेहरे-मोहरे और कुछ संवाद बहुत कुछ साफ कर देते हैं। लेकिन सिनेमा की भारतीय समाज में अब उस तरह की पकड़ नहीं है, जैसे पचास साल पहले होती थी या दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में अब भी है।

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राजीव लोचन साह