शमशेर सिंह बिष्ट


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आनन्द स्वरुप वर्मा
October 26, 2018

 बिष्ट जी से मेरी पहली मुलाकात तकरीबन 37 साल पहले 1981 के शुरुआती महीनों में हुई थी। मार्च 1980 से समकालीन तीसरी दुनिया का प्रकाशन शुरू हुआ था और यह अंक निकलते ही उन्होंने एक पोस्टकार्ड भेजा। पत्रिका की प्रशंसा करते हुए कुछ अंकों की मांग की और लिखा कि वह और उनके साथी हर माह ‘थर्ड वर्ल्ड यूनिटी’ मंगाते और पढ़ते हैं लेकिन अंग्रेजी में होने की वजह से उन्हें दिक्कत होती है। समकालीन तीसरी दुनिया की 25-30 प्रतियां नियमित तौर पर चेतना प्रेस अल्मोड़ा के पते पर जाने लगीं। फिर एक दिन मैंने बस ली और अल्मोड़ा पहुंच गया। उन दिनों वह पलटन बाजार में रहते थे। उनके साथ पूरे एक दिन और एक रात मैं रहा और देर रात तक हम लोग बातचीत करते रहे। तब से उनके निधन तक यह संबंध बना रहा। उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी और उत्तराखंड की परिवर्तनकामी शक्तियों से यह मेरा पहला संपर्क था। बिष्ट जी के जरिए ही गिर्दा, राजीव लोचन शाह और शेखर पाठक से परिचय हुआ जिसका आगे चलकर पीसी तिवारी, उमा पाठक, खड़क सिंह खनी, कमला पंत, प्रदीप टम्टा, हरीश पंत सहित उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी और उत्तराखंड छात्र संगठन के ढेर सारे साथियों के साथ विस्तार हुआ। यह संबंध आज भी किसी न किसी रूप में बना हुआ है हालांकि तमाम वस्तुगत कारणों से पहले जैसी ऊष्मा नहीं रही। मैदानी इलाकों में काम करने वाले पहाड़ के मेरे मित्रों मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, वीरेन डंगवाल, प्रभाती नौटियाल,पंकज बिष्ट आदि में वीरेन ही एकमात्र थे जिनका पहाड़ के साथ जीवंत  संबंध था और शायद ही ऐसा कभी हुआ हो जब साल में दो-तीन बार नैनीताल या अल्मोड़ा जाते समय मैंने रास्ते में बरेली में रुक कर वीरेन को अपने साथ न लिया हो I यह सिलसिला वीरेन के निधन से एक-दो वर्ष पूर्व तक बदस्तूर जारी रहा I वीरेन तो मुझे ‘उत्तराखंडी’ ही मानता था और साथी राजेंद्र धस्माना को हैरानी होती थी पहाड़ में मेरे मित्रों की तादाद देखकर।

बिष्ट जी ने पहाड़ में आंदोलनकारियों की पीढ़ी की पीढ़ी तैयार की। उनका पूरा जीवन ही आंदोलनमय था। 1972 में वे छात्र संघ के अध्यक्ष थे और छात्र राजनीति के दौरान भी उन्होंने अपनी सोच का दायरा परिसर तक सीमित नहीं रखा और सामाजिक सवालों को उठाया। शुरुआती दिनों के वन आंदोलन से लेकर हाल के गैरसैण को राजधानी बनाने के आंदोलन तक उत्तराखंड में जितने भी आंदोलन रहे, उनका इतिहास बिष्ट जी के उल्लेख के बिना अधूरा रह जाता है। जीवन के अंतिम दिनों में भी शरीर से असमर्थ होने के बावजूद वह बराबर यही सोचते रहे कि कैसे जनता की जीवन स्थितियों में बदलाव लाया जाए जिससे इस खूबसूरत राज्य से लोगों का पलायन रुके।

बिष्ट जी में दृढ़ता और लचीलेपन का अद्भुत संयोग था। उनके स्वभाव की यह विशिष्टता ही युवकों को उनकी ओर आकर्षित करती थी। उत्तराखंड के प्रमुख आंदोलनकारी दिवंगत खड़क सिंह खनी ने 2007 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘सूरज को तो उगना ही था’ में बताया है कि कैसे बिष्ट जी के संपर्क में आने के बाद उनका जीवन ही बदल गया। वह जीवन, जो मित्रों के साथ इसी चर्चा में बीतता था कि आज कितने पर्यटकों की जेब काटी या कितनों को झांसा दिया, अचानक एक नई दिशा की ओर मुड़ गया—“मुझे शमशेर सिंह बिष्ट की बातें आज भी अच्छी तरह याद हैं। उन्होंने मुझसे कहा- देखो खड़क सिंह! अपना घर परिवार तो हर कोई पालता है। कुत्ते बिल्ली और चिड़िया को देखते हो? वे अपने बच्चों को किस तरह पालते हैं? तुम तो आदमी हो। तुम्हें समाज के बारे में, देश दुनिया के बारे में सोचना चाहिए। नहीं तो कल तुम्हें कोई याद नहीं करेगा। कुत्ते बिल्ली की तरह रहोगे। उन्हीं की तरह अपने बच्चे पालोगे और उन्हीं की तरह मर जाओगे। फिर इस दुनिया में तुम्हारा नाम लेने वाला कोई नहीं रहेगा। क्या तुम ऐसी मौत मरना पसंद करोगे? या ऐसी मौत चाहोगे जिससे दुनिया तुम्हें याद करें… उनकी बातों से मैं बहुत प्रभावित हुआ।” इसी प्रसंग में खड़क सिंह खनी ने उस क्षण को याद किया है जब वह बिष्ट जी के साथ पैदल अपने गांव नैलपण की ओर जा रहे थे-“रास्ते भर वे मुझे मार्क्स, लेनिन और माओ के बारे में बताते रहे। लेनिन और माओ ने अपने अपने देश में कैसे शोषण विहीन समाज की स्थापना की, मजदूर- किसान और दबा-कुचला तबका वहां किस तरह सत्ता का भागीदार बना आदि आदि बातें वे मुझे समझाते रहे। शहीद भगत सिंह के बारे में उन्होंने मुझे काफी कुछ बताया। कहा, भगत सिंह मार्क्स-लेनिन की विचारधारा से सहमत थे। वे शोषण विहीन समाज की स्थापना के हिमायती थे।“

अप्रैल 1982 में एक विशाल सम्मेलन के जरिए नई दिल्ली में इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) का गठन हुआ। इससे पहले ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के तत्वावधान में निरंकुशता विरोधी राष्ट्रीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें अप्रैल के सम्मेलन के लिए एक संयोजन समिति बनी थी। समिति में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि शामिल थे। पहाड़ का प्रतिनिधित्व शमशेर सिंह बिष्ट कर रहे थे। संयोजन समिति की विभिन्न बैठकों के दौरान उनके साथ बातचीत करने और उन्हें समझने का हम सभी लोगों को काफी अवसर मिला। इंडियन पीपुल्स फ्रंट के गठन के बाद 51 सदस्यों की जो राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनी उसमें भी उत्तराखंड से शमशेर सिंह बिष्ट को चुना गया। नवंबर 1984 में आईपीएफ का दूसरा राष्ट्रीय सम्मेलन कलकत्ता में आयोजित किया गया। कलकत्ता अधिवेशन के बाद आईपीएफ और उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के बीच मतभेदों की जो शुरुआत हुई उसकी दुर्भाग्यपूर्ण परिणति वाहिनी के विभाजन और विघटन के रूप में सामने आई। इसके पीछे कारण क्या थे, विवाद के मुद्दे क्या थे, पार्टीगत निहित स्वार्थ क्या थे और उन स्वार्थों को संचालित करने वाली कौन शक्तियां थीं जो क्रांतिकारिता की आड़ में एक घृणित राजनीति कर रही थीं, इन पर कभी बाद में चर्चा की जा सकती है लेकिन इतना बताना जरूरी है कि वह ऐसा दर्दनाक क्षण था जिसमें मैंने बिष्ट जी को ही नहीं बल्कि वाहिनी से जुड़े अनेक साथियों को अत्यंत क्षुब्ध और विचलित पाया। संघर्ष वाहिनी को व्यवस्थित रूप देने, उस का संविधान बनाने, उसका एक सांगठनिक ढांचा खड़ा करने ताकि वह किसी ‘एक व्यक्ति की मनमानी’ पर न चल सके जैसे तर्कों का हवाला देकर मुख्य रूप से शमशेर सिंह बिष्ट और पीसी तिवारी की जिन लोगों ने घेराबंदी की और वाहिनी के कामों में बाधा पैदा की उसका एक बहुत दुखद इतिहास है। खड़क सिंह खनी भी बिष्ट जी के विरोध में दिखाई दे रहे थे। एक रात कमला पन्त के साथ खनी नोएडा स्थित मेरे निवास पर आए और देर रात तक इस विषय पर चर्चा होती रही। चूंकि मुझे राजनीतिक साजिशों का कुछ आभास हो गया था इसलिए मैंने खनी को सुझाव दिया कि फिलहाल वाहिनी को सांगठनिक रूप देने  के अपने कार्यक्रम को मुल्तवी रखें क्योंकि इससे आने वाले दिनों में उत्तराखंड में चल रहे आंदोलनों को बहुत क्षति पहुंचने जा रही है लेकिन मेरी बात पर उन्होंने भी ध्यान नहीं दिया। मुझे अच्छी तरह याद है कि उन दिनों भी शमशेर सिंह बिष्ट ने कभी उन साथियों के प्रति किसी कटुता का प्रदर्शन नहीं किया जिन्हें वह समझ रहे थे कि वे उनके और वाहिनी के खिलाफ खड़े हुए हैं जबकि मैं, जो कि वाहिनी का सदस्य नहीं था, उन लोगों के प्रति बेहद क्रोध महसूस कर रहा था।

4 मार्च 1986 के अपने एक पत्र में उन्होंने मुझे लिखा:

“…आपको आईपीएफ से हमारे संबंध के बारे में पूरी जानकारी होगी। जब से इसकी स्थापना हुई तभी से हमलोगों के मतभेद जारी थे । बार बार हम कहते रहे कि इसको वास्तविक रूप में व्यापक जन संगठन का रूप देना है तो अंदरूनी व वाह्य संबंध को एक करना होगा परंतु अंदरूनी प्रभाव हमेशा मुख्य बना रहा। आईपीएफ के कुछ साथियों ने इस विरोध को सकारात्मक रूप में न लेकर नकारात्मक रूप से लिया और उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी में भी एक ग्रुप पैदा करने की कोशिश की। हम लोगों का आज भी यह  विश्वास है कि राष्ट्रीय धारा से जुड़ना आवश्यक है। लेकिन अविश्वास की स्थिति में अधिक स्थाईपन बन नहीं पाता। यही हमारे साथ हुआ है…बीच में आईपीएफ के अध्यक्ष श्री सुब्बाराव और श्री अखिलेंद्र अल्मोड़ा आए थे। वे सारी स्थिति से अवगत होकर गए हैं। सुब्बाराव जी का वक्तव्य दैनिक पत्रों में वास्तविक स्थिति के संदर्भ में छपा परंतु अभी जनवरी के ‘जनमत’ में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी को दो  दिखाया गया। उत्तराखंड में तो एक संघर्ष वाहिनी है परंतु आईपीएफ अपने मुखपत्रों के माध्यम से दो दिखाने में लगी है। यहाँ तक कि व्यक्तिगत स्तर पर भी अत्यंत निम्न व झूठी बातों को फैलाने का प्रयास किया गया। मैंने हमेशा संगठन में आईपीएफ को सकारात्मक व मजबूती से लाने का प्रयास किया, नेतृत्वकारी साथियों में जो भ्रम आईपीएफ को लेकर पैदा होता था उसको दूर करने का प्रयास किया लेकिन आईपीएफ अपने अंदरूनी साथियों के माध्यम से इन भ्रमों को सत्य में परिणत कर देता था। लगभग 10-12 सालों से संघर्षरत साथी पीसी तिवारी, निर्मल जोशी, गिर्दा आदि साथियों के प्रति भी अविश्वास पैदा करने का प्रयास किया गया है।“

1987 में मैंने अपने कुछ साथियों के साथ हिंदी भाषी क्षेत्रों में तीसरी दुनिया अध्ययन केंद्र की स्थापना का और साथ ही अल्पमत गोराशाही के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका में चल रहे संघर्ष पर फ़िल्में दिखाने का कार्यक्रम बनाया। इस सिलसिले में अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ का कार्यक्रम बना। मौसम खराब होने की वजह से हम लोग पिथौरागढ़ नहीं जा सके लेकिन अल्मोड़ा और नैनीताल का कार्यक्रम काफी अच्छा रहा और इसमें शमशेर सिंह बिष्ट और राजीव लोचन साह की प्रमुख भूमिका रही। 1992 में वैकल्पिक मीडिया से संबंधित हमारे अभियान में भी बिष्ट जी ने सक्रिय भूमिका निभाई। बिष्ट जी केवल आंदोलनकारी नहीं बल्कि एक समर्थ पत्रकार भी थे। ‘जंगल के दावेदार’ का संपादन करने के साथ साथ वह नियमित तौर पर विभिन्न अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में जो टिप्पणियां लिखते थे उनसे उत्तराखंड की धड़कन का पता चलता था।

जुलाई 2013 में अल्मोड़ा के सेवॉय होटल में तीसरा हेमचंद्र पांडे स्मृति व्याख्यान का आयोजन हुआ था। विषय था ‘कारपोरेट लूट, तबाही और पत्रकारिता के दायित्व’। बिष्ट जी को सक्रिय तौर पर मैंने अंतिम बार वहां देखा। उसके बाद से जब भी उनसे मुलाकात हुई, उनका स्वास्थ्य उन्हें सक्रिय होने से रोकता  था। फोन पर उनसे प्रायः लंबी बातें होती थीं जिनसे उनके सरोकारों का पता चलता था। चिंता जाहिर करते थे जनतंत्र के निरंतर हो रहे क्षरण पर, जनतांत्रिक स्पेस के सिकुड़ते जाने पर, फासिस्ट प्रवृत्तियों के उभार पर और वामपंथी शक्तियों की निष्क्रियता पर। निधन से लगभग एक  माह पूर्व उनसे जब मेरी भेंट हुई तो उनके चेहरे की चमक देखकर खुशी हुई। मैं अपनी पत्नी के साथ गया था और वह भी सपरिवार थे- एम्स के बगल में स्वामी अग्निवेश के फ्लैट में। मैंने कहा कि अब तो आप काफी ठीक हो गए हैं और उन्होंने भी उम्मीद जताई कि बस जल्दी ही वह सक्रिय हो सकेंगे। न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि वह जरूर पहले की तरह स्वस्थ हो जाएंगे लेकिन ऐसा हो न सका…

बिष्ट जी की कमी शायद ही कभी पूरी हो।

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आनन्द स्वरुप वर्मा

आनन्द स्वरुप वर्मा पत्रिका 'समकालीन तीसरी दुनिया' के सम्पादक रह चुके हैं. उन्होंने कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है, इन दिनों वे स्फुट लेखन कर रहे हैं.