एक बौद्धिक क्षमता का असमय क्षय…अलविदा एल. मोहन


नैनीताल समाचार
October 8, 2018
(2013 में उनकी खजुराहो यात्रा का चित्र)

व्योमेश जुगरान/अद्धैत बहुगुणा

यह विडम्बना ही है कि जो व्यक्ति अभी 10-15 दिन पहले तक पौड़ी जिला अस्पताल में एक अदद फिजीशियन की तैनाती को लेकर माहभर से अधिक चले धरने का सूत्रधार रहा हो, वही आज इसी अस्पताल की दुरावस्था का शिकार होकर चल बसा। यदि उसे समय पर उपचार की प्राथमिक/जरूरी सहायता मिल जाती तो शायद उसके प्राण बचाए जा सकते थे। वे प्राण, जो हम सब यानी सारे समाज के लिए बेहद कीमती थे।

6 अक्टूबर का शनिवार हमारे प्यारे दोस्त एल. मोहन यानी ललित कोठियाल के लिए काल का पैगाम लेकर आया। सुबह करीब आठ बजे वह पौड़ी स्थित मकान के अपने कमरे में बेसुध मिले। किरायेदार ने उनके घनिष्ठ मित्रों को इत्तला दी तो वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मुदगिल इत्यादि भागे-भागे पहुंचे। हालत बता रही थी कि दिल का दौरा पड़ा है। तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया गया। उस जिला अस्पताल, जहां इस तरह के मरीजों का एकमात्र इलाज है- रैफर..। ललित भी श्रीनगर बेस अस्पताल को रैफर कर दिए गए। वहां पहुंचने में वक्त लगना ही था। जाहिर है देर हो चुकी थी। उनका जीवन लौटाया नहीं जा सका। काश, पौड़ी अस्पताल में ऐसी गंभीरावस्था का सामना करने के आवश्यक इंतजामात होते! कई बार लगता है कि ललित मरे नहीं, बल्कि व्यवस्था के क्रूर हाथों मार दिए गए। हमारी बौद्धिक प्रतिभाओं का ऐसा असमय क्षय हमें मंजूर नहीं।

ललित कोठियाल पत्रकारिता, इतिहास, समाज व संस्कृति से जुड़े सरोकारों के एक अपरिमित संसार में विचरते हुए अकेले बेशक रहते रहे हों मगर अजीजों और शुभचिन्तकों का जो आभामंडल उन्होंने बनाया था, वह किसी मेले से कम न था। शहर की हर गतिविधि का वह एक अनिवार्य अंग थे। उमेश डोभाल स्मृति समारोह के सालाना आयोजन की सारी श्रमशक्ति का स्रोत वही थे। इतिहास का अध्येता होने के नाते उन्हें देश के हर ऐतिहासिक शहर से प्रेम था। समय-समय पर उन्होंने वहां की यात्राएं कीं और लेखन इत्यादि के माध्यम से वहां के बारे में कुछ न कुछ नया हम सबको वितरित भी किया। खासकर, उत्तराखंड़ के प्रमुख नगरों की विकास-यात्रा की पड़ताल का उनका काम बजोड़ है।

इन दिनों वह उनके प्रिय शहर पौड़ी के इतिहास पर अपने अनमोल काम को अंजाम देने के अंतिम दौर में थे। इस नगर के इतिहास से संबंधित प्रामाणिक दस्तावेजों को ढूंढ-ढूंढ कर लाने की लालसा उनमें खब्त की हद तक थी। जब भी इस बारे में उनसे फोन पर बात होती, नए-नए विस्मयी तथ्यों की जानकारी मिलती। इतिहास का जिज्ञासु यह दुर्लभ अन्वेषी असमय खुद इतिहास बन जाएगा, मन इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं। तुम जाने में जल्दी कर गए दोस्त! तुम्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि…।

10 अप्रैल 1959 को पौड़ी में उद्योग विभाग में कार्यरत वासवानन्द कोठियाल (मूल रूप से मैठाणा चमोली के निवासी) के जेष्ठ पुत्र के रूप में जन्में ललित भाई बचपन से ही मेधावी छात्र रहे । मैसमोर इंटर कालेज से इंटर करने के बाद उन्होंने बी.एस.सी. पौड़ी कैम्पस से की इसके उपरान्त उन्होंने अन्नामलाई विश्वविद्यालय से भौतिकी में परास्नातक की डिग्री ली।
बचपन से ही कुशाग्र ललित भाई 70 के दशक से ही देश की विभिन्न विज्ञान पत्रिकाओं में लिखने लगे थे। वे विज्ञान पत्रकार के रूप में ही जाने गये। हलांकि 80 और 90 के दशक में उन्होंने पौड़ी में हिल्ट्रान के स्थानीय प्रबन्धक के रूप में कम्प्यूटर शिक्षा में भी अपना अहम योगदान दिया। स्थानीय आंचलिक पत्र—पत्रिकाओं में लेखन के अलावा वे देश की प्रतिष्ठित विज्ञान प्रगति, साइंस डाइजेस्ट, द डिकेन जनरल आफॅ ह्यूमन साइसेंज की पत्रिका डिकेन साइंस, साइंस टुडे आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से जीवन पर्यन्त जुड़े रहे। विज्ञान के छात्र होने के बावजूद उनकी इतिहास पर भी जबरदस्त पकड़ थी। गढ़वाल और कुमाऊँ का इतिहास भी उनके प्रिय विषय रहे।

यायावर घूमन्तु प्रवृत्ति के कारण वे अविवाहित ही रहे। देश के चप्पे—चप्पे को उन्होंने देखा समझा और जो समझा उसे पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से वे लोगों के बीच बांचते रहे। पौड़ी के इतिहास, भुगोल और सांस्कृतिक यात्रा पर उनका सम्पादित ग्रन्थ सफरनामा यों तो उन्हें हमारे बीच सदैव जीवित बनाये रखेगा किन्तु उसका अगला अंक जो वे तैयार कर चुके थे अब कैसे सामने आयेगा ये हम सब की सामुहिक जिम्मेदारी बन गयी है।

 

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