परम श्रद्धेय अजय भट्ट जी और इंदिरा ह्दियेश जी के चरणों में कुछ ‘शब्द पुष्प’


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चारू तिवारी
November 30, 2018

परम आदरणीय अजय भट्ट जी को तो आप सभी लोग जानते हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष। मान्यवर के पास अपनी मधुरवाणी से लोगों को ‘ठगने-छलने’ का हुनर है। यह अलग बात है कि अपनी वाणी का जो आवरण वह ओढ़े रहते हैं वह बहुत जल्दी हट जाता है। अजय भट्ट उत्तराखंड की राजनीति के सबसे बड़े ‘मसखरे’ हैं (परम ‘आदरणीय’ और ‘मान्यवर’ मैंने पहले ही लिख दिया है ताकि संसदीय भाषा पर सवाल न उठे। ) । ‘सतही’ और ‘नासमझी’ से अंदर तक भरे हुये। जब भी बोलते हैं तो हल्कापन और नासमझी साफ झलकती है। इस व्यक्ति को अभी तक उत्तराखंड की एबीसी का पता नहीं है। उत्तराखंड का दुर्भाग्य है कि हम इन जैसे नेताओं को ढोने के लिये मजबूर हैं, जिन्हें धेले की अकल नहीं है। अभी अजय भट्ट ने गैरसैंण को लेकर जो बयान दिया है वह उनकी नासमझी की पराकाष्ठा है। अजय बोलते हैं कि गैरसैंण में विधानसभा सत्र इसलिये नहीं लगना चाहिये क्योंकि यह पैसे की बर्बादी है। यहां सत्र लगने से उन्हें बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उनके ड्राइवर और अर्दलियों को गाड़ी में सोना पड़ता है। इससे पहले इनके आका मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने कहा था कि भराणीसैंण में हवा चलती है, इसलिये यह राजधानी के लिये उपयुक्त नहीं है। इसलिये इन ‘नासमझों ‘ से पहाड़ को बचाने की जरूरत है।

जहां तक अजय भट्ट के मौजूदा बयान का सवाल है, उसके आलोक में इनकी मंशा की पहचान की जानी चाहिये। स्वनामधन्य अजय भट्ट ने राजधानी गैरसैंण पर अब तक जितने भी बयान दिये हैं उनमें उनकी पहाड के बारे में जानकारियां साफ झलकती हैं। इन ने इन अठारह सालों में कभी गैरसैंण को राजधानी नहीं माना है। और न ही ये राजधानी के नाम पर वहां निर्माण कार्य कर रहे हैं। अजय भट्ट ने कहा कि हम गैरसैंण में झील बना रहे हैं। वहां का विकास कर रहे हैं, फिर यहां ग्रीष्मकालीन राजधानी के बारे में सोचा जायेगा। पहले हम यहां ढांचागत विकास करेंगे। जबकि हमारे साथ बने झारखंड और छत्तीसगढ़ की राजधानियां उसी दिन तय हो गई थी जिस दिन राज्य का निर्माण हुआ। नया रायपुर जो छत्तीसगढ़ की राजधानी थी वह एक रात में नहीं बन गई। पहले उन्होंने अपनी राजधानी घोषित की और फिर अपनी आकांक्षाओं अनुरूप एक बेहतरीन शहर का निर्माण किया। झारखंड ने भी अपनी राजधानी रांची तय की और उसे अपने अनुरूप बनाया। अभी हाल में तेलंगाना राज्य बना। उसके हिस्से में हैदराबाद आया। आंध्र प्रदेश ने अपनी राजधानी ‘अमरावती’ तय की वह आज दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरो में एक बनने जा रहा है, जिसके बनने के बाद ‘अमरावती’ आंध्र की राजधानी हो जायेगी। इसके उलट उत्तराखंड राज्य जब बना तो उसके पुनर्गठन विधेयक में एक ही लाइन लिखी थी कि जो भी पहली चुनी सरकार आयेगी वह स्थाई राजधानी का चयन करेगी। भाजपा-कांग्रेस जैसी जनविरोधी और पहाड़ विरोधी पार्टियां उस विधेयक में स्थाई राजधानी के लिये गैरसैंण का नाम नहीं जोड़़ पाई जो आंदोलनकारियों की मांग थी। जनता की चुनी हुई राजधानी थी। भाजपा की पहली अंतरिम सरकार आई तो उसने असंवैधानिक तरीके से स्थाई राजधानी चयन आयोग बनाया जिसका नाम ‘दीक्षित आयोग’ था। ग्यारह बार बढाये गये और आठ साल तक चले इस आयोग का क्या फैसला आया उसे भी सरकारें सही तरीके से विधानसभा पटल पर नहीं रख पाई। अब भी एक तरफ जहां गैरसैंण में विधानसभा भवन और अन्य निर्माण कार्य चल रहे हैं वहीं सरकारें देहरादून में भी विधानसभा और सचिवालय के जमीनें तलाशती रही हैं। इनसे इनमें दोमुहेंपन का पता चलता है। इसलिये जनता मांग करती है कि पहले विधानसभा में गैरसैंण को राजधानी बनाने का विधेयक पास करो, फिर इसके निर्माण में जितना समय लगेगा हम उसका इंतजार करेंगे। लेकिन गैरसैंण को अपनी राजनीति के लिये फुटबाॅल बनाना बंद करें।

जहां तक अजय भट्ट का सवाल है, वह तमाम लोगों की धोती पकड़कर ऊपर चढ़े हैं। ये उस दौर में उभरे हैं जब आरएसएस-विश्व हिन्दू परिषद-भाजपा मिलकर देश में ‘अराजक’ और ‘नासमझ’ युवाओं की फौज तैयार कर रही थी। रामजन्मभूमि के नाम पर। उस रैले में बहुत सारे अजय भट्ट पैदा हुये। दुर्भाग्य से बाद में यही सत्ताशीर्ष पर पहुंचे। उस समय पैदा हुये इन नेताओं को आप देखेंगे तो लगभग आपको इसी मानसिकता के मिलेंगे। इंदिरा गांधी ने भी संजय गांधी को आगे कर कांग्रेस में ऐसे युवाओं को आगे किया जो बाद में देश के लिये नासूर बने। इसलिये हमें अजय भट्ट के बयान के साथ उस राजनीति को समझना होगा जो इन जैसे लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाती है। जब हम लोग गैरसैंण में विधानसभा का घेराव कर रहे थे। तब मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने कहा था कि भराणीसैंण में हवा चलती है। उसी दौरान उन्होंने सहारनपुर को उत्तराखंड में मिलाने की बात कही थी। अभी सरकार ने कहा है कि पहाड़ में जमीनों के कानूनों को सरल बनाया जायेगा ताकि कोई भी पहाड़ में सरलता से जमीन खरीद सके।

एक और नेता हैं। जिनका नाम इंदिरा हदयेश है। वे उत्तराखंड में नेता प्रतिपक्ष हैं। वहुत पुरानी नेता हैं। कांग्रेस की। हल्द्वानी में बड़ा नाम है उनका। उन्हें गैरसैंण में जाड़ों में ठंड लगने का डर है। ये वह इंदिरा हदयेश हैं जिनका एक बेटा तमाम कोशिशों के बाद भी इंटर पास नहीं कर पाया। उस समय वे उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की सदस्य थी। तब अपने रसूल का इस्तेमाल करते हुये उन्होने अपने बेटे को कपकोट के चौड़ास्थल से प्राइवेट फार्म भरवाया। चौड़ास्थल स्कूल को नकल केन्द्र के रूप में तब्दील कर दिया। उस समय के जिला विद्यालय निरीक्षक अल्मोड़ा इंदिरा हदयेश के बेटे को पास करने के लिये पूरी परीक्षा में विद्यालय में पहरा देते रहे। कपकोट विकास खंड चौड़ास्थल जहां सिथत है वहां गैरसैंण से भी ज्यादा ठंड लगती है। लोग इंदिरा हदयेश से पूछें कि अपने नालायक बेटे को पास कराने के लिये जब तुम गैरकानूनी काम करने कपकोट के चौड़ास्थल जैसी ठंडी जगहों में जा सकते हो तो राजधानी में तीन दिन के सत्र के लिये गैरसैंण क्यों नहीं जा सकते। हम कहना चाहते हैं तुम्हारी राजनीति में पहाड़ शोषण की जगह से ज्यादा कुछ नहीं। तुम्हारे बेटों ने पहाड़ की उंचाइयों में आकर नकल से इंटर पास कर अब मैदान में बड़े रिजार्ट और होटल खोले हैं। वे ही अब हमें राजनीति भी बता रहे हैंं। और आप हैं कि आपको गैरसैंण में ठंड लग रही हैं।

इन दोनों पार्टियों के ‘सतही’ नेताओं के बयानों के बाद ‘स्थायी राजधानी गैरसैंण संघर्ष समिति’ने फैसला लिया है कि हम इन नेताओं के तमाम भ्रष्टाचार, संपत्ति और इनके जनविरोधी चरित्र को पूरे तथ्यों के साथ जनता के बीच ले जायेंगे। पिछले दिनों हमने पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक की जो जनसंवाद यात्रा की थी उसके बाद हमने वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की जयन्ती पर 25 दिसंबर को श्रीनगर में इकट्ठा होने का फैसला किया है। हम बार—बार कहते हैं कि हम स्थाई राजधानी गैरसैंण के आलोक में पूरे पहाड़ के सवालों को देखना चाहते हैं। इसलिये इन नेताओं के चरित्र को भी समझना जरूरी है। इनकी संपत्ति, जमीनों के सौदे आ​दि की पहली किस्त भी वहां जारी की जायेगी। यह भी तथ्य भी रखा जायेगा कि नित्यानन्द स्वामी से लेकर त्रिवेन्द्र रावत तक किस तरह इन सभी मुख्यमंत्रियों के शासन में पहाड़ का सौदा किया गया है। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि जगह—जगह अजय भट्ट और इंदिरा हदयेश के पुतले फूंके जायें, लेकिन हमने कहा कि पुतला फूंकने की औपचारिकता के बजाय इनके पूरे वजूद पर हमला करना है। रावण को हर साल जलाना होता है, वह हर साल पैदा हो जाता है। इसलिये उसके पूरे वजूद को समाप्त करने की जरूरत है। अजय भट्ट और इंदिरा हदयेद्श अकेले नहीं हैं। असल में इनकी पार्टियां हमारे बारे में ऐसा ही सोचती हैं। इसलिये इस लड़ाई को छोटा न समझा जायें इनके बयानों को व्यक्तियों द्वारा दिया गया न समझा जाय। आइये इस लड़ाई को लड़ते हैं।

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चारू तिवारी

दिल्ली में रह कर फ्रीलान्स रूप से पत्रकारिता कर रहे चारू तिवारी उत्तराखंड के आन्दोलनों की परम्परा से सक्रिय रूप से जुड़े हैं.