पंचेश्वर बांध : ‘प्रशासन कर रहा है ‘वन अधिकार कानून’ का उल्लंघन’


रोहित जोशी
February 10, 2018

“..नेपाल और भारत का सीमांकन करने वाली महाकाली नदी पर पंचेश्वर में 311 मीटर का बांध बनाए जाने की कवायद की जा रही है। इसके लिए वन हस्तांतरण की प्रक्रिया के तहत प्रशासन, प्रभावित ग्राम पंचायतों से अनापत्ति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करवा रहा है। जिसका गैरक़ानूनी बताते हुए कई जन संगठन, ग्राम प्रधान और बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं।..”

​प्रशासन द्वारा, पंचेश्वर बांध के लिए, प्रभावित पंचायतों से वन मंजूरियों की अनापत्तियां लेने के लिए जिन प्रपत्रों में हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं उन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पंचेश्वर बांध का विरोध कर रहे जन संगठनों, प्रभावित क्षेत्र के कुछ ग्राम प्रधानों, बुद्धिजीवियों, वक़ीलों और पर्यावरणविदों ने प्रशासन पर आरोप लगाया है कि अनापत्ति के लिए जिस तरह प्रपत्रों में हस्ताक्षर करवाया जा रहे हैं यह वन अधिकार कानून का सीधे-सीधे उल्लंघन है।

बीते दिनों प्रस्तावित बांध से प्रभावित होने वाली कुछ ग्राम सभाओं के प्रधानों और महाकाली लोक संगठन ने जनजाति कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार और अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग, उत्तराखंड को एक पत्र लिख कर प्रशासन द्वारा वन अधिकार कानून 2006 के उल्लंघन की शिकायत की है। इस पत्र में यह बात दोहराई गई है कि पंचेश्वर बांध के लिए वन भूमि के हस्तांतरण के लिए प्रशासन द्वारा जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है वह वन अधिकार कानूनए 2006 का उल्लंघन करती है।

कनारी गांव के ग्राम प्रधान लक्षमण चंद भी उन प्रधानों में हैं जिन्होंने यह पत्र लिखा है। वे कहते हैं, “प्रशासन सोचता है कि हम कुछ नहीं जानते। लेकिन हमें हमारे अधिकार पता हैं। जिस तरह, प्रशासन पंचायतों से पंचेश्वर बांध के लिए वन हस्तांतरण के संबंध में अनापत्तियां ले रहा है, यह वन अधिकार कानून की धारा 4 (1) और 4 (5) का उल्लंघन है। हमारे जंगलों पर हमारा अधिकार है और कोई भी हमसे इन्हें छीन नहीं सकता।”

गेठीगाड़ा के प्रधान पुष्कर सिंह का कहना है, ”हम इस बांध के पक्ष में नहीं हैं। हमें मालूम है कि यह हमें कई तरह से नुकसान पहुंचाएगा। हमारे गांव, हमारे जंगल, संस्कृति, सभ्यता सभी चीज़ों के लिए यह बांध ख़तरनाक है। सरकार हमारे गांवों को हमारे जंगलों को डुबोकर किसका विकास करना चाह रही है?”

कई जन संगठन, वक़ील और पर्यावरणविदों ने भी प्रशासन पर एफआरए 2006 के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा है कि ”प्रशासन, वन मंजूरी के लिए अनापत्तियां जुटाने की प्रक्रिया में स्थानीय पंचायतों पर अनुचित दबाव डाल रहा है।”

महाकाली लोक संगठन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता सुमित महर कहते हैं, ”यह बिल्कुल स्पष्ट है कि एफआरए 2006, न सिर्फ अनुसूचित जनजातियों के बल्कि अन्य वनाश्रित समुदायों के जंगलों पर पारंपरिक अधिकारों को ​कानूनी तौर पर सुनिश्चित करता है। इसलिए इस कानून को भारत में वंचित तबकों के लिए एक मील के पत्थर के तौर पर माना जाता है।” सुमित आगे कहते हैंं, ”उत्तराखंड का प्रत्येक गांव पारंपरिक तौर पर पिछली कई पीढ़ियों से वनों पर आश्रित रहा है। वनों के बिना उत्तराखंड के ग्रामीण समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए उत्तराखंड का प्रत्येक गांव वन अधिकार कानून के दायरे में आता है। लेकिन वन अधिकार कानून इसे नज़रअंदाज कर ग़लत प्रक्रिया अपना रहा है।”

इस​बीच, पिथौरागढ़ ज़िला प्रशासन का दावा है कि पंचेश्वर बांध से प्रभावित अधिकतर गांव वन अधिकार कानून के दायरे में नहीं आते हैं। प्रशासन का कहना है, ”जिन प्रक्रियाओं को प्रशासन ने अपनाया है वे किसी भी तरह वन अधिकार कानून का उल्लंघन नहीं करती हैं।”

पिथौरागढ़ के ज़िला अधिकारी सी. रविशंकर का इस मसले पर कहना है, ”वे लोग जो कह रहे हैं कि उत्तराखंड का प्रत्येक ग्रामीण समुदाय एफआरए के दायरे में आता है, वे ग़लत हैं। उत्तराखंड में बहुत सारा क्षेत्र वन आ​च्छादित है। ऐसे में प्रत्येक गांव किसी ना किसी तरह वनों पर निर्भर रहता है। लेकिन ये गांव वन ​अधिकार कानून की स्पष्ट परिभाषा के दायरे में नहीं आते हैं।” ज़िलाधिकारी का कहना था कि प्रस्तावित पंचेश्वर बांध से प्रभावित होने वाले गांवों में केवल दो गांव ऐसे हैं जो एफआरए के दायरे में आते हैं, और ये गांव उत्तराखंड की अनुसूचित जनजाति ‘वनराजियों’ के गांव हैं।

हालांकि, उत्तराखंड उच्चन्यायालय में वक़ील और उत्तराखंड में वन अधिकार कानून के तहत सेटलमेंट किए जाने के लिए लंबे समय से काम कर रहे, तरुण जोशी ज़िलाधिकारी के इस बयान से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, ”या तो प्रशासन को एफआर एक के बारे में जानकारी नहीं है या फिर वह स्थानीय समुदायों को उनके अधिकारों के बारे में गुमराह करना चाह रहा है। एफआरए ऐसे सभी समुदायों के वनों पर अधिकार को सुनिश्चित करता है जो कि परंपरागत तौर से वनों पर आश्रित रहे हों। अनु​सूचित जन​जाति के संबंध में यह नियम है कि उन्हें 2005 से पहले से वनों पर आश्रित रहना होगा और अन्य वनाश्रित समुदायों के लिए यह नियम 75 वर्ष या ​तीन पीढ़ियों से वनों पर आश्रित रहने का है।”
तरुण जोशी आगे बताते हैं कि उत्तराखंड और हिमाचल के विशेष परिप्रेक्ष में, भारत सरकार के जनजातीय कल्याण मंत्रालय ने कई ऐसे आदेश जारी किए हैं जिनमें इस ​स्थिति को और अध्किा स्पष्ट किया गया है। ”इन आदेशों के अनुसार, उत्तराखंड और हिमाचल का प्रत्येक गांव को एफआरए के तहत उनके वनों पर अधिकार दिए गए हैं जिस पर वे पारंपरिक रूप से निर्भर रहे हैं।

नेपाल और भारत का सीमांकन करने वाली महाकाली नदी पर पंचेश्वर में 311 मीटर का बांध बनाए जाने की कवायद की जा रही है। इसके लिए वन हस्तांतरण की प्रक्रिया के तहत प्रशासन, प्रभावित ग्राम पंचायतों से अनापत्ति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करवा रहा है। जिसका गैरक़ानूनी बताते हुए कई जन संगठन, ग्राम प्रधान और बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं।

सभी तस्वीरें साभार : विनोद उप्रेती

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रोहित जोशी

स्वतंत्र पत्रकार, संपर्क : rohit.versatile@gmail.com