अब इमरान की बारी


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राजीव लोचन साह
August 1, 2018

क्रिकेट के सर्वकालिक महान आॅल राउण्डरों में से एक, इमरान खान के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने के साथ ही भारतीय उप महाद्वीप के भू राजनैतिक परिदृश्य में एक बड़ा बहुत बड़ा बदलाव आया है। 1996 में ‘पाकिस्तान तहरीके इन्साफ’ पार्टी के साथ अपने राजनीति की शुरूआत करने वाले इमरान के लिये यह रास्ता तय करना बहुत आसान नहीं रहा। मगर अब अपने देश की सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने के बाद वे भारत से कैसे रिश्ते पसन्द करेंगे, यह देखना ज्यादा जरूरी है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, जिन्हें इस बार इमरान की पार्टी ने धूल चटा दी, वहाँ की सेना की नजरों में भारत के प्रति काफी नरम माने जाते थे। इसलिये यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना ने इमरान खान की खुल कर मदद की और यहाँ तक कि मीडिया को भी आतंकित करने की कोशिश की। पनामा पेपर्स में नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश होने, जिससे उन्हें अन्ततः जेल तक जाना पड़ा, के बाद नवाज शरीफ के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़ने में भी सेना ने इमरान खान की मदद की। इसीलिये इन चुनावों के नतीजे आने के बाद अन्य पार्टियाँ चुनाव में धांधलेबाजी के आरोप भी लगा रही हैं। जाहिर है कि इमरान खान पर सेना का काफी नियंत्रण होगा और यह भारत के लिये अच्छी खबर नहीं है। जिस तरह भारत में सत्ताधारी दल के द्वारा पाकिस्तान को लेकर घृणा और उन्माद का वातावरण तैयार किया जा रहा है, सीेमा के उस पार भी उसी तरह का माहौल बनेगा तो भारतीय उप महाद्वीप में एक और लड़ाई शुरू होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। हालांकि पाकिस्तान में अब तक काफी धैर्य और समझदारी है और वहां की जनता इस्लामी आतंकवादियों से भारत से कहीं ज्यादा नफरत करती है। इसका उदाहरण भी इस चुनाव में मिला, जब 280 सीटों पर प्रत्याशी खड़े करने वाले लस्करे तोइबा को जनता ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

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राजीव लोचन साह