आप इमाम मौलाना इमदादुल रशीदी को जानते हैं?


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जितेन्द्र भट्ट
April 2, 2018

जो काम आसनसोल के अफसर न कर सके, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया। जो काम आसनसोल की पुलिस न कर सकी, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया। जो काम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को करना चाहिए था, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया। जो काम देश के प्रधानमंत्री को करना चाहिए था, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया।

साल 2018। मार्च के आखिरी हफ्ते में हमें जहां लाकर खड़ा कर दिया गया है। वहां हमें मौलाना इमदादुल रशीदी के बारे में जरुर बात करनी चाहिए। यकीन मानिए, मौलाना इमदादुल रशीदी आपके पांच मिनट के हकदार हैं। आपको यकीन न हो,तो भी इसे मेरी इल्तिजा समझिए। मैं चाहता हूं आप मुझे अपने पांच मिनट दें। आप सोचते होंगे कि मौलाना इमदादुल रशीदी कौन सी बला है? कोई मौलाना हिंदुस्तान में कैसे इतना अहम हो सकता है कि उसपर पांच मिनट भी खर्च किए जाएं? सवाल ये भी हो सकता है कि ये मौलाना रशीदी है कौन? कैसा दिखता है?

मैं चाहता हूं कि आप थोड़ा अंदाजा लगाएं। वो एक छरहरे बदन का इंसान है। उम्र, शायद 40 से 45 के बीच होगी। ये मेरा अंदाजा है। उसी तरह जैसे किसी गोल टोपी वाले को अक्सर बेझिझक आतंकवादी मान लेने का अंजादा लगा लेते हैं, हम। हां, मौलाना रशीदी जालीदार टोपी पहनते हैं। उनके चेहरे पर मुल्लों वाली दाढ़ी है। मूंछें कुछ कम। थोड़ा ऊंचा पाजामा पहनते हैं, मौलाना रशीदी। लेकिन ये वो बातें हैं। जो सबको दिखती हैं। मौलाना इमदादुल रशीदी इससे भी आगे की चीज है। मैं इस मौलाना का पूरा नाम बार बार लिखूंगा। ताकि आप इस नाम को कभी भूल न पाएं।

मौलाना इमदादुल रशीदी का एक सोलह का बेटा था। अब वो खुदा के पास चला गया है। दरअसल कहानी यही है। मौलाना इमदादुल रशीदी आसनसोल के नूरानी मस्जिद के इमाम हैं। रामजी की कृपा कहें या खुदा का फजल; रामनवमी के दिन तक सब ठीकठाक था। वो पच्चीस मार्च का दिन था। सुबह से लेकर शाम तक शहर में रामनवमी के जुलूस निकले। लेकिन शाम के अंधेरे के साथ शहर की फिजा में एक अजीब सी दुर्गंध फैल गयी। सुबह से लग रहे नारों में मातम का शोर घुलने लगा।

मौलाना इमदादुल रशीदी की जिंदगी पर दुखों का पहाड़ टूटने वाला था। आसनसोल में हिंसा हुई, उपद्रवियों की भीड़ ने इमाम मौलाना इमदादुल रशीदी के बेटे सिबतुल्ला की हत्या कर दी। सिबतुल्ला दसवीं में पढ़ता था। अखबारों में खबर छपी है कि सत्ताईस मार्च को जब शहर में दंगे हो रहे थे, चारों ओर हिंसा फैली थी। दंगाई सिबतुल्ला को पकड़कर ले गए। एक दिन बाद 28 मार्च को सिबतुल्ला की लाश मिली।

मरने वाला नूरानी मस्जिद के इमाम का बेटा था। इमाम यानी धर्म का ठेकेदार। ठेकेदार अक्सर हिंसा पर उतारु हो जाते हैं!धर्म चाहे जो हो। हिंदूओं में भी बहुत ठेकेदार हैं। लेकिन इमाम मौलाना इमदादुल रशीदी अलग मिट्टी का बना है। 29 मार्च के दिन मौलाना इमदादुल रशीदी ने दिल पर पत्थर रखकर बेटे को दफनाया। इमाम साहब रोए। रोते रहे। 16 साल का बेटा चला गया था। जिस वक्त आसनसोल को नफरत से फैली हिंसा डस रही थी। मौलाना इमदादुल रशीदी ने अपने दिल और दिमाग को संभाल लिया। 2018 में यही वो काम है, जो सबसे मुश्किल हो गया है। आप संभलना भी चाहें, तो बहुत सी बातें होंगी। जो आपको ऐसा करने से रोक देंगी। लेकिन कहा ना, मौलाना इमदादुल रशीदी अलग मिट्टी का है।

बेटे की आखिरी यात्रा में इमाम साहब के चाहने वाले हजारों की संख्या में पहुंचे। आसनसोल का प्रशासन परेशान था कि इमाम साहब के बेटे की हत्या के बाद कहीं शहर में हालात और न बिगड़ जाएं। पर मौलाना इमदादुल रशीदी ने कमाल कर दिया। आसनसोल में कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। उन्होंने अपने चाहने वालों के बीच अमन की बात की। लोगों से मिलजुल कर रहने को कहा। मौलाना इमदादुल रशीदी ने कहा, ‘‘ मैंने बेटे को खोया है। इसे मुद्दा न बनाएं। अगर आप मुझसे प्यार करते हैं, तो अमन बहाल करें।’’

मौलाना इमदादुल रशीदी ने कहा, “मैंने अपना बेटा खोया है। मुझे इसका गम है। लेकिन मैं किसी से बदला नहीं लेना चाहता। अगर किसी ने मेरे बेटे का नाम लेकर दंगा फैलाया। लोगों को भड़काने की कोशिश की, तो मैं शहर छोड़कर चला जाऊंगा।“ इमाम साहब की इस बात का असर हुआ। लोगों को बात समझ आई। आसनसोल में सोलह साल के सिबतुल्ला को दफन किया गया। तो लोगों की आंखों में आंसू थे। दिल में गम था। गुस्सा नहीं था। मौलाना इमदादुल रशीदी की बातों का असर था। और इस असर ने नफरत और गुस्से को मुहब्बत में बदल दिया था।

जो काम आसनसोल के अफसर न कर सके, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया। जो काम आसनसोल की पुलिस न कर सकी, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया। जो काम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को करना चाहिए था, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया। जो काम देश के प्रधानमंत्री को करना चाहिए था, वो मौलाना इमदादुल रशीदी ने किया। और ऐसा करके मौलाना इमदादुल रशीदी ने बताया। खुदा का बंदा किसे कहते हैं? मैं नहीं चाहता कि आप मौलाना इमदादुल रशीदी को उसकी तस्वीर से पहचानें। मैं चाहता हूं कि जब भी कोई जालीदार टोपी वाला, हल्की मूंछों वाला और भरी दाढ़ी वाला कोई दिखे। तो आप उसे गले लगाएं। मैं चाहता हूं कि आप उसे मौलाना इमदादुल रशीदी के बारे में बताएं।

मैं जानता हूं। कुछ टोपी वाले नहीं मानेंगे। वो नफरत पालेंगे। गुस्सा फैलाएंगे। वो खुदा को परेशान करेंगे। मुझे पता है। कुछ रामजादे भी नहीं मानेंगे। वो राम को शर्मिंदा करने पर तुले हैं।

 

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जितेन्द्र भट्ट

जितेन्द्र भट्ट ने नैनीताल समाचार से पत्रकारिता शुरू करने के उपरान्त पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की. आजकल एक टीवी न्यूज़ चैनल में काम करते हैं.