आज की लड़ाई के सूत्र इतिहास में हैं


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राजीव लोचन साह
June 2, 2018

88 वर्ष पूर्व इसी दिन टिहरी रियासत के कारिन्दों ने रवाईं-जौनपुर में, यमुना के तट पर तिलाड़ी के मैदान पर अपनी माँगों को लेकर जनसभा कर रहे निहत्थे किसानों को गोली चला कर भून डाला था। ये किसान टिहरी के राजा द्वारा दिन पर दिन अनापशनाप टैक्स लादे जाने से परेशान थे। मगर उनकी न्यायपूर्ण माँगों पर ध्यान देने के बदले रियासत द्वारा उनका दमन करना ज्यादा उचित समझा गया

यह उत्साहजनक है कि आज की समस्याओं का समाधान ढूँढने के लिये स्थानीय इतिहास और परम्पराओं से रास्ता निकालने की प्रवृत्ति तेजी पकड़ रही है। हिमालय दिवस जैसे एन.जीओ. पोषित कार्यक्रमों से ऐसे आयोजन ज्यादा कारगर हैं। 30 मई को तिलाड़ी कांड की बरसी मनाना इसका एक अच्छा उदाहरण है। 88 वर्ष पूर्व इसी दिन टिहरी रियासत के कारिन्दों ने रवाईं-जौनपुर में, यमुना के तट पर तिलाड़ी के मैदान पर अपनी माँगों को लेकर जनसभा कर रहे निहत्थे किसानों को गोली चला कर भून डाला था। ये किसान टिहरी के राजा द्वारा दिन पर दिन अनापशनाप टैक्स लादे जाने से परेशान थे। मगर उनकी न्यायपूर्ण माँगों पर ध्यान देने के बदले रियासत द्वारा उनका दमन करना ज्यादा उचित समझा गया। बताया जाता है कि इस हत्याकांड में सौ से अधिक लोग मारे गये थे। कुछ घटनास्थल पर तो कुछ जेल में। यह घटना जलियाँबाग कांड से कम बर्बर नहीं थी, लेकिन कुछ दशकों पहले तक उत्तराखंड का सामान्य पढ़ा-लिखा व्यक्ति इस घटना से अनभिज्ञ था। कुछ समय पहले स्थानीय स्तर पर तिलाड़ी कांड की बरसी मनाई जानी शुरू हुई और फिर प्रदेश के अनेक स्थानों पर ऐसे आयोजन होने लगे। इस बार देहरादून के टाऊन हाॅल में आयोजित तिलाड़ी कांड की बरसी में मौजूद लोगों की संख्या को देख कर लग रहा था कि पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के इन 18 वर्षों में पूरी तरह निराश हो चुकी जनता अब यमुना घाटी के उन किसानों के साथ अपने को मानसिक रूप से जोड़ रही है। एक स्तर पर इन 88 सालों में परिस्थितियों में कोई बदलाव आया ही नहीं। एक ओर उत्तराखंड के ग्रामीण अपने वनाधिकारों से अभी भी वंचित हैं; जंगली जानवरों के आक्रमण से खेती के नष्ट होने और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण तेजी से पलायन कर रही है तो दूसरी तरफ किसी शेखचिल्ली के सपने की तरह बनाई जा रही आॅल वेदर रोड के लिये बहुमूल्य पेड़ काट डाले जा रहे हैं।

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राजीव लोचन साह