26वीं नैनीताल समाचार निबन्ध प्रतियोगिता


नैनीताल समाचार
November 2, 2018

रमदा

एक ऐसे समय में, जब घर से बाहर या अभिभावकों की सतर्क नजर से परे, अपनी मर्जी और अपने समय पर अपने मन या अपनी पसंद का खेल अपने दोस्तों के साथ खेलते हुए बच्चों को देख पाना कभी-कभार ही मुमकिन हो पाता हो, नैनीताल समाचार की निबन्ध प्रतियोगिता के कनिष्ठ वर्ग (कक्षा 4,5,6 के विषय: मुझे खेलना पसंद है) के एक सौ तैंतीस निबंधों को पढ़ना, खेल को लेकर उनके मनोभावों को जानने, समझने का एक अनूठा अवसर है। खेलना बच्चों की नैसर्गिक प्रवृत्ति है। बच्चों के खेल यदि खेल के लिए हैं तो वह उनकी कल्पना को पंख और उन्हें अपने आप को पहचानने का अवसर देते हैं। शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जरूरी हैं, आत्मविश्वास को आधार देते हैं। एकाग्रता, स्व-अभिव्यक्ति, सामाजिकता और सामूहिकता का कारक बनते हैं, अपने और दूसरों के मनोभावों को जानने और आपसी विवादों को निपटाने की प्रक्रिया में आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान, रचनात्मकता और ऊर्जा के बहिप्र्रवाह को अवसर देते हैं। दोस्तों के साथ मिल कर खेल के सामान को जुटाने और आवश्यक वातावरण के सृजन की कोशिशों में उनका व्यक्तित्व निखरता है और इस सब से कहीं ऊपर है खेल से उत्पन्न होने वाला मनोविनोद और आनन्द।

किन्तु स्व-निदेशित और अपने आप में साध्य क्रीड़ा (खेल खेल के लिए) अब विलुप्तप्राय है। मौजूदा दौर में बच्चों के खेल भी एक संगठित और आयोजित गतिविधि हैं। खेल अब एक निश्चित रूपरेखा, कार्यक्रम, नित्यचर्या, सामग्री-उपकरणों, उत्तरदायित्वों, प्रशिक्षकों और यहां तक कि निर्धारित वस्त्रों (ट्रैक-सूट आदि) से जुड़ी गतिविधि है। आनन्द अब क्रीड़ा का साध्य नहीं रहा। साध्य पुरस्कार, पदक या उपलब्धियां हैं। आनन्द अधिक से अधिक सह उत्पाद हो सकता है। अपने निबंधों में बच्चों ने भी खेल में नाम कमाने, माँ-बाप का नाम रोशन करने, बहुत बड़ा खिलाड़ी बन कर खेल में कैरियर बनाने, राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने या सानिया नेहवाल, पी.वी.सिंधु, विराट कोहली जैसा बन सकने की ही चर्चा ज्यादातर की है, क्रीड़ाजनित आनन्द और मजे की बहुत कम। बच्चों के खेल से जुड़ा एक पहलू पढ़ाई का भी है। बच्चों को बहुत सारा पढ़ना है, अभिभावक और माता-पिता चाहने लगे हैं कि उनका पाल्य हर विषय में श्रेष्ठतम प्रदर्शन करे और उसका अंक प्रतिशत ऐसा हो कि सबकी आँखें खुली की खुली रह जायें। जाहिर है ऐसे में एक दिन में बच्चे को उपलब्ध कुल समय के लिए पढ़ाई और खेल परस्पर खींचातानी करते हैं, किन्तु मुझे लगता है कि इतनी सारी जरूरतों में बाँधा जा रहा खेल और बाजार द्वारा परोसी जा रही वीडियो और ऑनलाइन गेम्स की खतरनाक दुनिया कई बार बच्चों के लिए उलझनों, चिंताओं, उत्कंठा और यहां तक कि अवसाद की वजह भी बन सकती है।

अपने निबंधों में बच्चे कह रहे हैं कि ‘‘अब मैं क्या करूँ कि मुझे खेलना अच्छा लगता है। यह तो हर बच्चे का स्वभाविक जीवन है। मेरी माता जी मुझे हर समय कहती है पढ़ो- पढ़ो- पढ़ो…..तो मुझे मजबूरी में आकर पूरे दो-तीन घंटा पढ़ना पड़ता है। फिर जब मैं बोलता हूँ कि मैं खेलने जा रहा हूँ तो कहती है… जरा सा पढ़ता है और अब खेलना है….सभी माताजीयों को पढ़ने का समय कम लगता है और खेलने का ज्यादा….’’ रोहित कन्याल, लांग व्यू पब्लिक स्कूल। ‘‘मैं बड़े हो के एक बैडमिंटन खिलाड़ी बनना चाहती हूँ। बहुत बड़ा….. कभी जब मैं अपने घर आऊं और सब बोलें की हमारी बच्ची बहुत बड़ी बैडमिंटन वाली खिलाड़ी बन चुकी है……कोई भी खेल की प्रतियोगिता हो तो उन खेलों में हमेशा जीतूँ ….अपने घर को सजा दूँ इन खेलों में जीती हुई ट्रौफी और मैडल को।’’ आयुशी अतचैनी (प्रथम पुरस्कार), नैनी पब्लिक स्कूल। ‘‘विज्ञान भी कहता है की फोन और टीवी से भी बिमारी होती है। पर ये लोग बात समझना चाहते ही नही अपने साथ बच्चों को भी बिमार करते है। यदि वे अपने बच्चों को फोन देने से अच्छा उनके साथ खेल लें तो उनको भी खुशी और स्वास्थ भी सही रहेगा।’’ स्वाति बर्गली (द्वितीय पुरस्कार), मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर।

‘‘….बच्चे का ध्यान पढ़ाई से पहले या किसी भी चीज से पहले खेल-कूद में होता है…..हर बच्चे को खेल-कूद का हक है और यह हक उससे कोई भी नहीं छीन सकता है। चाहे बच्चे गाड़ी से खेले, मिट्टी से खेले या फिर बरतन से खेले खेलना तो खेलना ही होता है…..हर बच्चा खेलना चाहता है लेकिन अपने मम्मी-पापा के डर से नहीं खेल पाता है…….आप अपने बच्चे को जबरदसती पढ़ा तो सकते हो लेकिन खिला नहीं सकते…….एक बार बच्चे को खेलने दीजिये वह आपके बच्चे की जिन्दगी बदल देगा……बच्चे को बहुत खुश कर देगा और उसे कुछ अलग करने का मौका मिलेगा……पढ़ाई भी मन लगाकर करने लगेगा।’’ निहाल मुबारक (तृतीय पुरस्कार), ओकवुड स्कूल। ‘‘कृप्या वास्तव मे हम खेलकूद से खराब हो जाएगे अर्थात हमारा करियर चैपट हो जायेगा…..लेकिन हर व्यक्ति के मन मे खेलकूद के प्रति इतनी रूचि होति है कि उसके कदम अनायास भी खेल के मैदान की तरफ बड़ जाते है……पेरेंटस अपने बच्चों कि पढ़ाई के पीछे दिन रात पढ़े रहते है….बच्चा शत प्रतिशत अंक लाये यही उनका उदेश्य होता है।’’ गौरव नैनवाल, उमा लवली स्कूल।

हम, तथाकथित बड़े, खेल के बारे में जितना जानते हैं, कह सकते हैं कि बच्चों की जानकारी का स्तर उससे कहीं भी कमतर नहीं है। यह बात दीगर है कि उनकी भाषा में हिज्जों और मात्राओं की गड़बड़ी है। सोचने वाली बात यह है कि इन गड़बड़ियों की जिम्मेदारी हम भाषा सिखाने वालों पर है, बच्चों पर नहीं।

‘‘मुझे खेलना पसंद है और सबको होना चाहिए क्योंकि खेल से हमें अच्छे बुरे नए दोस्त मिलते हैं और खेल हमें एक साथ काम करना और एकाग्रता सिखाता है। आयुष कुमार शर्मा, माउण्ट ऐल्बर्न स्कूल ‘‘हम बच्चों पर पहले से ही पढ़ाई को लेकर इतना मजबूर कर देते हैं। अरे अभी बच्चा छोटा है बच्चे की खेलने की उमर है। बच्चे खेलेंगे नहीं तो क्या करेगे।’’ आयुशी ध्यानी, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर।‘‘बच्चे अपने माता-पिता के डर से खेल नहीं पाते क्योंकि जब भी वे खेलने जाते हैं तो उनके माता-पिता उन्हें रोक लेते हैं।’’ कौशिक गंगवार, ओक वुड स्कूल। ‘‘आजकल के बच्चों को देखिये बाहर कम और फौन पे ज्यादा खेलते हैं। वे आँनलाइन गेम खेलते रहते हैं। जिनसे उनके दिमाग का विकास उन बच्चों से धीरे होता है जो बाहर खेलते हैं, न कि फोन पर….वे चिडचड़े, गुस्सैल हो जाता है। जिसके कारण वे ठीक से अपनी जिन्दगी जी नहीं पाते। वे बहुत डरपोक हो जाते हैं। मयंक रावत, द होली ऐन्जिल। ‘‘खेलना हमारे जीवन का एक हिसा है। वह हमे बहुत कुछ सिखाता है. खेलने हम गिरते भी है। पर गिरकर ही तो हम सिखते है। अर्पिता खत्री, नैनी पब्लिक स्कूल।

इन निबंधों के रास्ते बच्चों के खेलों की दुनिया से गुजरते हुए मेरे लिए यह जानना सबसे सुखद है कि सर्वव्यापी, सर्वग्राही और सर्वभक्षी बाजार द्वारा रोज परोसे जा रहे नए-नए वीडियो और ऑनलाइन गेम्स के बावजूद हमारी बहनों के बचपन के कुछ ऐसे खेल अभी भी अस्तित्व में हैं जिन्हें हमने विलुप्त मान लिया था। ‘‘मुझे गुड़िया से खेलना पसंद है क्योंकि वह बहुत सुंदर होती है और हम उससे कुछ भी कह सकते है क्योंकि वो हमारी बाते ना ही सुनती है ना कुछ कहती है…..गुडिया का मैं नाम भी रख सकती हूँ …उसे दुल्हन जैसे सजा सकती हूँ, उसे मार भी सकती हूँ…..मैं उसे अपना जैसा बनाना चाहती हूँ।’’आंचल, जी.आई.सी तल्लीताल। ‘‘मुझे घर-घर खेलना पसंद है। मेरी कई दोस्ते है जो मेरे साथ खेलती है…कुछ दोस्त भाभी बन जाती है। और कुछ दुकानदार बन जाती है। और जब हम खेलते है तो अपने नाम बदल देते है। और एक टीचर बन जाती है और कुछ बच्चे बन जाते है। हम बाहार पर चटाई बिछाकर उसमे सो जाते है। फिर थोड़ी देर बाद उठ जाते है। फिर अपनी-अपनी छोटी बहनों को स्कुल पहुचाने जाते है।’’निशा आर्या, नर्सरी स्कूल, माल रोड।

मध्यम वर्ग (कक्षा 7,8,9) को दिए गए विषय ‘क्या ट्यूशन जरूरी है’ में निश्चिततः आयोजकों का मंतव्य व्यक्तिगत-प्राइवेट ट्यूशन से रहा है। ट्यूशन का शब्दार्थ भले ही शिक्षण हो इस दौर में ‘भावार्थ’ या व्यावहारिक अर्थ व्यक्तिगत शिक्षण अर्थात विद्यालय में होने वाले औपचारिक शिक्षण से इतर निजी अनौपचारिक शिक्षण व्यवस्था से है। इस व्यवस्था के कारण, परिणाम, फायदे या नुकसान जो भी हों, माना यही जाता है कि होती यह बच्चों के लिए ही है। इसलिए चलिए पहले बच्चों को ही सुनते-पढ़ते हैं:  ‘‘बच्चे माता-पिता के दबाव में आकर ट्यूशन जाते हैं या शायद इसलिए कि उन्हें स्कूल में पढ़ाया कुछ भी समझ में नहीं आता या वो समझना नहीं चाहते। बच्चों का ट्यूशन जाना एक मजबूरी भी हो सकती है एक शौक भी क्योंकि अगर किसी बच्चे को कुछ समझ नहीं आता तो वह अपने शिक्षकों से दोबारा पूछ सकते हैं……अगर गाँवों की बात की जाये तो ट्यूशन को तो छोड़ो बच्चे स्कूल जाने तक को तैयार नहीं रहते…..शहरों की ओर चलें तो बच्चा-बच्चा ट्यूशन जाता है…….माता-पिता अगर अपने बच्चों को खुद ही घर पर पढाएं तो वह ज्यादा फायदेमंद रहेगा……अगर लोग ये सोचते हैं कि सुबह बच्चों को स्कूल भेज दें और शाम को ट्यूशन और अपना बेफिकर होकर कहें कि वह अपनी कक्षा में अव्वल आएगा या अच्छे अंकों से पास हो जायेगा तो वह गलत सोचते हैं।’’ दीपिका बहुखंडी (प्रथम पुरस्कार), कक्षा 7, भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय। ‘‘गली-मोहल्ले में ट्यूशन-ट्यूशन की दरकार भी है भरमार भी है। अगर बच्चे स्कूल में ध्यान से टीचर की पढ़ाई हुई चीज को अगर एक बार घर में मन लगाकर 10 मिनट भी अच्छे से…..तो ट्यूशन जाने की जरूरत ही नहीं है। लेकिन माँ-बाप बच्चे के ऊपर मेहनत ही नहीं करना चाहते…तो ट्यूशन…. अब बताइए ट्यूशन पढ़ाने वाले तो अपनी जेब भर रहे हैं, और बच्चा तो काला अक्षर भैंस बराबर ही रहा, न स्कूल, न ट्यूशन से फायदा……बच्चे होमवर्क भी ट्यूशन में करते हैं……सभी अभिभावकों के लिए यह सन्देश है कि अगर अपने बच्चों को पढ़ाना व आगे बढ़ाना है तो खुद भी उन पर मेहनत करनी होगी……अगर अभिभावक ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं, तो अपने बच्चों को मजबूरी में ट्यूशन भेज सकते हैं, लेकिन पढ़े लिखे अभिभावक भी बच्चों को ट्यूशन भेज रहे हैं।’’ प्रांजल शर्मा (द्वितीय पुरस्कार), कक्षा 8, माउंट एल्बर्न स्कूल, भीमताल। ‘‘आज के दौर में एक आम बच्चे का दिन कुछ इस प्रकार होता है: सुबह-सुबह उठो, सुबह ट्यूशन जाओ, स्कूल के लिए तैयार हों, स्कूल में पांच या छह घंटे पढ़ाई करो, स्कूल से वापस आओ, फिर शाम को ट्यूशन जाओ, वापस आओ, घर आकर अपना गृह-कार्य पूरा करो, और सो जाओ…..और इस ही प्रक्रिया में वे खेल-कूद भी नहीं करना चाहते क्योंकि वह सोचते हैं कि अगर वे परीक्षा में अच्छा न करें तो उन्हें अपमानित किया जायेगा।’’ ऋषभ जोशी (तृतीय पुरस्कार), कक्षा 8,माउन्ट एल्बर्न स्कूल, भीमताल।

‘‘ट्यूशन कोई बूरी चीज नहीं है लेकिन अगर ट्यूशन की आदत हो जाये तो बच्चा पढ़ नहीं पाता। अगर ट्यूशन छूड़ा दिया जाये तो वह पढ़ने में कमजोर हो जाता है….. जिसकी आर्थिक स्थिती ठीक है वो तो ट्यूशन पढ़ सकता है पर आर्थिक स्थिति ठीक न हो तो। लोग भूल गए हैं कि ज्ञान बाँटने से ज्ञान बढ़ता है। लेकिन लोगो ने ज्ञान को कमाई का साधन बना दिया है।’’ मयंक भाकुनी, कक्षा 8 (तृतीय पुरस्कार), जी.बी.पन्त जी.आई.सी., भवाली। ‘‘ट्यूशन इसलिए जरूरी है क्योंकि जिन बच्चों या विद्यार्थियों के घर में कोई बड़ा पढ़ाने वाला नहीं होता, उनके लिए ट्यूशन जरूरी है….कुछ माता-पिता दिखावे के लिए अपने बच्चों को ट्यूशन भेजते हैं।…. बचपन में ट्यूशन जरूरी नहीं है क्योंकि ऐसा करने से आपकी विषय अध्यापक-अध्यापिका का अपमान होता है कि कैसा पढ़ाती है के विद्यार्थी को समझ में नहीं आता। क्योंकि कोई माता-पिता अपने बच्चे की गलती नहीं मानते की मेरा बच्चा पढ़ने में कमजोर है। बल्की यही कहेंगे कि अच्छे से पढ़ाया नहीं होगा। इसलिए बच्चों को पहले खुद मेहनत करनी चाहिए फिर ट्यूशन का सहारा लेना चाहिए।’’ खुशी शर्मा (तृतीय पुरस्कार), कक्षा 9, मोहन लाल साह बा.वि.म. इंटर कॉलेज। ‘‘कुछ बच्चों का बचपन से ही ट्यूशन लगा दिया जाता है जब वे नर्सरी में होते है तब से ही…..उनका खेलने का समय, टी.वी. देखने का समय, शर्राते करने का समय सब ट्यूशन ले लेता है। इस कारण उसका शारीरिक और मानसिक विकास नहीं को पाता वो पढ़ई से जी चुराने लगता है। जिसके कारण मत-पिता दुखी रहने लगते हैं व कभी तो एक के बदले दो दो या तीन तीन ट्यूशन लगा देते हैं।’’ खुशबू जोशी, कक्षा 8, जी.जी.आई.सी, नैनीताल।

‘‘आज दिन ब दिन शिक्षा में नए-नए परिवर्तन किये जा रहे है। रोजाना नए-नए सरक्यूलर पास किये जा रहे हैं…….दिन ब दिन पढ़ाई का बोझ बढ़ रहा है जो विद्यार्थी की मुसीबतों को बढ़ा रहा है जिससे बचने का एकमात्र उपाय है ट्यूशन……पढाई में बढता कॉम्पटीशन देख सभी विद्यार्थी ट्यूशन का सहारा ले रहे हैं।’’ आरव भारद्वाज, कक्षा 9, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार। ‘‘भीड़भाड़ की पढ़ाई के कारण आजकल विद्यार्थी ट्यूशन लेने लगे हैं…..एक विद्यार्थी अपनी कक्षा में बीस या तीस बच्चों के साथ बैठता है, तो अध्यापक उन सारों बच्चों को पढ़ाता है इसलिए बच्चा अपनी शंका को हटा नहीं पाता है…..ट्यूशन में अच्छा समझता है।’’ अभिजीत सिंह, कक्षा 9, शेरवुड कॉलेज। ‘‘ट्यूशन एक प्रकार का धंदा बन गया है भारत में लगभग हर घर का एक बच्चा ट्यूशन पड़ रहा है क्योंकि उसके दिमाग ने विद्यालय में पड़ते समय ध्यान देना बंद कर दिया है इसलिए उसे ट्यूशन की आवश्यकता पड़ रही है और ट्यूशन पड़ाने वाले ट्यूशन की आड़ में धंदा कर रहे हैं।’’ प्रियाशु बिष्ट, कक्षा 9, ए.डी. जी.आई.सी, पटवाडांगर। ‘‘आज ट्यूशन एक पढ़ाई के माध्यम से ज्याधा, माता-पिताओं द्वारा अपने सर आये बच्चों को पढ़ाने के झाड़ को हटाना हो गया है…..आज अपने बच्चों को पढ़ाना कई बार मुश्किल सा प्रतीत होता है और इसका एक सरलतम रासता है: ट्यूशन।’’ सान्धिय मारुत साह कक्षा-9, लाँगव्यू पब्लिक स्कूल। ‘‘वैसे तो आजकल विद्यालय में भी अध्यापक अच्छे से कुछ भी नहीं समझाते……अपना फोन छोड़ेंगे तभी तो बच्चों को पढ़ायेंगे।’’ पूजा पोखरिया, एन.एस.जे.एस.एस.एन स्प्रिग फील्ड। ‘‘विद्यालयों में अध्यापिकायें अपने विषय की किताब जल्द खतम करने की सोचती हैं। क्योकि समय बहुत ही कम होता है……ट्यूशन वाले सर या अध्यापिका हमें उस प्रश्नावली को बार-बार समझाएगी। ट्यूशन में हम अपनी परेशानी बता सकते हैं……विद्यालय की अध्यापिकाओं को भी बता सकते हैं. लेकिन विद्यालय की अध्यापिका को गुस्सा आ जाता है……बता तो देती है लेकिन डरने के कारण वह प्रश्न समझ में ही नहीं आता।’’ अंजली सिटाला, कक्षा 9, मोहन लाल साह बालिका विद्या मन्दिर।

‘‘ट्यूशन इसलिए जरूरी है क्योंकि आजकल विद्यालयों में अध्यापक बहुत कम हैं व अध्यापक अपना पाठ पूर्ण करने के लिए विद्यार्थियों को बिना समझाए हुए जल्द से जल्द अध्यन कराते रहते हैं तो विद्यार्थियों के पास ट्यूशन के अलावा कुछ और उपाय नहीं होता।’’ अवंतिका आर्या, कक्षा 9, मोहन लाल साह बालिका विद्या मन्दिर। ‘‘हर कक्षा में पचास-साठ बच्चे होते हैं और जो शिक्षक शिक्षिका पढ़ा रहे-रही होती हर बच्चे पर ध्यान नहीं दे पाती है। और जो बच्चे कक्षा में सबसे पीछे बैठे होते है उनको तो अच्छे से बलैकबोर्ड ही नहीं दिखता….अगर बच्चा दोबारा पूछे तो अध्यापक गुस्सा हो जाते है और कई बार मारते भी है।’’मयंक पाण्डे, कक्षा 9, होली ऐंजिल्स स्कूल। ‘‘कुछ अध्यापक होते है या अध्यापिका बच्चो को फोर्स करते है कहते है, अगर तुम हमारे पास ट्यूशन नहीं पढ़ोगे तो हम तुमहे फेल कर देंगे अगर तुम ट्यूशन हमारे पास पढ़ोगे तो हम तुमहे अच्छे नमबरों से पास कर देंगे।’’ मो. अयान मिकरानी, कक्षा 9, सेंट जेवियर स्कूल। ‘‘बालक का पहला ट्यूशन अध्यापक उसका परिवार होता है। बच्चे या विद्यार्थी को सबसे पहले उसके माता-पिता उसके ट्यूशन टीचर होते है…….टीचर अपने ट्यूशन में पढ़ने वाले छात्रों को पास अवश्य करता है।’’ अंकित तिवारी, जी.बी. पन्त जी.आई.सी, भवाली ।

जाहिर है निजी, व्यक्तिगत शिक्षण, ‘ट्यूशन’, का तकरीबन हर आयाम बच्चों की नजर में है और अपनी जबान में इसे अभिव्यक्ति देने में भी वे सफल रहे हैं। ट्यूशन लम्बे समय से अस्तित्व में हैं। आज से साठ साल पहले मेरी स्कूली पढ़ाई की शुरूआत के दिनों में भी थे। किन्तु तब बच्चा और अभिभावक या कम से कम बच्चा इसमें अपनी संलग्नता को, अपनी कमजोरी को सार्वजनिक न होने देने के प्रयास में, जाहिर न होने देने की हर संभव कोशिश करता था। आज ट्यूशन डंके की चोट पर लिए जाते हैं। तब से अब तक इसने लम्बी यात्रा की है। तब बच्चे या शिक्षक के घर पर होने वाली यह गतिविधि (होम-ट्यूशन), समूह-शिक्षण (ग्रुप-ट्यूशन) से होते हुए आज घोर व्यावसायिक कोचिंग-सेंटर्स (कोचिंग-इंडस्ट्री) तक पहुँची है। मात्रा और फैलाव ऐसा है कि आज यह औपचारिक शिक्षा के समानांतर अपनी हैसियत रखता है और औपचारिक ढाँचा अपनी अनदेखी के कारण जितना चरमराता है यह उतना ही सशक्त होता जाता है। यह शिक्षा के औपचारिक तंत्र के निष्प्रभावी हो जाने का अकाट्य प्रमाण है। उत्तरदायी एक तो, जैसा बच्चों ने अपने निबंधों में इंगित किया है, विद्यार्थियों का कक्षा में सम्पादित होने वाले शिक्षण को ग्रहण करने में असमर्थ होना, दोषपूर्ण और लगनविहीन शिक्षण, प्रतिकूल विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात और पढ़ाई के केवल पास कर जाने तक सीमित होने जैसे कारण हैं। दूसरे ज्ञान, जानकारी या सीखने की तुलना में अंक-प्रतिशत के महत्वपूर्ण होते जाने की भी “ट्यूशन” को प्राप्त होने वाले महत्त्व में भूमिका है। माता-पिता या अभिभावकों के निर्णयों और दबावों की ओर भी बच्चों ने संकेत किया है। बच्चों ने साफ-साफ कहा है कि अभिभावकों के पास उनके लिए समय नहीं है। “ट्यूशन” का इंतजाम कर कई अभिभावक समझते हैं कि उन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह कर लिया है। कुछ की मजबूरी भी है क्योंकि वह खुद इतने पढ़े-लिखे नहीं हैं कि होमवर्क में अपने पाल्यों की मदद कर सकें। अंग्रेजी माध्यम ने भी कम बबाल पैदा नहीं किया है। किन्तु मामला इतना सीधा भी नहीं है। ट्यूशन” संबंधी घमासान सर्वाधिक माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर है क्योंकि यहीं विद्यार्थी और माता-पिता दोनों भविष्य को लेकर सर्वाधिक असुरक्षित अनुभव करते हैं। उच्चतर और पेशेवर शिक्षण-संस्थानों के द्वारों का खुलना, सम्बंधित गला काट प्रतियोगिता, परीक्षाओं की सफलताओं पर ही निर्भर है। अगर मुट्ठी भर कुछ संस्थाओं में बिना परीक्षा प्रवेश होता है तो भी आधार है अंक प्रतिशत। ट्यूशन के इस घमासान का सबसे आसान शिकार आर्थिक रूप से विपन्न वर्ग होता है और इससे विमुक्ति भी आसान नहीं है। सरल तो सरल, कठिन समाधान भी नहीं दिखाई देते। सरकारी कोशिशें अपने शिक्षकों द्वारा व्यक्तिगत ट्यूशनों पर आर.टी.एक्ट के सेक्षन 28 के तहत प्रतिबन्ध लगा देने जैसी निष्प्रभावी, निरुपयोगी होती हैं। शिक्षा की सरकारी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन एक शुरूआती कदम हो सकता है। किन्तु इसके लिए आवश्यक सोच,
चिंतन और इच्छा शक्ति कहाँ है ?

वरिष्ठ वर्ग (कक्षा 10 से 12) के लिए निर्धारित विषय ‘क्या शिक्षा हमें अन्ध विश्वास से मुक्त करती है’ से सम्बंधित निबंधों को पढ़ने के बाद अधिकांशतः निराशा ही होती है। जहां कक्षा 4 से लेकर कक्षा 9 तक के बच्चों की अभिव्यक्तियाँ मन में विश्वास जगाती हैं कि बच्चे चूंकि स्थितियों को ठीक से देखने-समझने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए बड़ा होने और अवसर मिलने पर वे उनमें बदलाव के लिए सक्रिय हो सकते हैं; वहीं वरिष्ठ वर्ग की प्रविष्टियों तक आते-आते यह उम्मीद और विश्वास खंडित होने लगता है। अधिकांशतः जैसे बिना दिमाग पर ज्यादा जोर डाले या विषय को समझे जबरदस्ती कागज भर देने या अनर्गल कुछ भी लिख देने की कोशिश की गयी है। इस वर्ग के निबंधों में की गयी उल्लेखनीय टिप्पणियां हैं: ‘‘माता-पिता ही अगर अपने बच्चों में अन्धविश्वास की नीव ढालें तो शिक्षा जो अपने अन्दर सारी दुनिया का भार संभाले हुए है वो मात्र एक शब्द मात्र रह जायेगी। शिक्षा हमें ज्ञान देकर अन्धविश्वास की सच्चाई तो बता रही है पर अन्धविश्वास की जंजीर में जंग मात्र भी नहीं लगा पा रही है।’’नम्र चैहान (प्रथम पुरस्कार), कक्षा 12, लेक्स इंटरनेशनल स्कूल। ‘‘माँ-बाप चाहे खुद किसी स्कूल में शिक्षक क्यों न हों फिर भी वे अपने बच्चों को मंगलवार, शनिवार जैस कई तरीको से नाखुन काटने से, बाल काटने से टोकते ही है…..अन्धविश्वास से कोई नहीं बचा है चाहे वह शिक्षित वर्ग हो या अशिक्षित।’’ सचिन पांडे (द्वितीय पुरस्कार), कक्षा 11, सी.आर.एस.टी. इन्टर कॉलेज। ‘‘अन्धविश्वास पल भर में नहीं आता परन्तु यह एक पेड़ की तरह होता है। जो धीरे-धीरे पनपता है और समय के साथ इसकी जड़ें और मजबूत होने लगती हैं। इसी वजह से बड़े लोगों को विज्ञान के तर्क को समझाना मुश्किल होता है लेकिन एक छोटे बच्चे को उसी तर्क में दिलचस्पी निर्मित होती है……पूजा करना अपनी आस्था और विश्वास पर निर्धारित होता है लेकिन अपनी सलामती के लिए किसी मूक की बलि चढ़ाना अन्धविश्वास होता है।’’ यश मिश्रा (तृतीय पुरस्कार), कक्षा 11, बिड़ला विद्या मंदिर।  ‘‘मौजूदा शिक्षा प्रणाली
अंधविष्वासों का खंडन करती है और छात्रों को इससे प्रभावित न होने की शिक्षा देती है। लेकिन फिर भी आज ये अन्धविश्वास प्रचलित हैं। इसका कारण यही है कि हम हर चीज शिक्षा से ही नहीं सीखते हैं, बल्कि इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका हमारा पड़ोस तथा हमारा समाज भी सिखाता है….इन अंधविश्वासों के प्रचलित होने का कारण हमारा समाज है। कौशिक गंगवार, ओक वुड स्कूल नैनीताल।
एक प्रतियोगी आशीष अधिकारी, जी.आई पटवाडांगर ने प्रतियोगिता के आयोजन के लिए आयोजकों को धन्यवाद देते हुए रुचिकर टिप्पणी की है कि ‘‘सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि मोबाइल भी लाने दिया जाता है और अगली बार बिस्कुट का पैकेट बड़ा रखना, इस बार काम चला रहा हूँ।’’

कुल मिलाकर लगता तो यही है ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीक के विकास और अनवरत प्रवाह के बाद भी अन्धविश्वासों की मौजूदगी है और ऐसा पूरी दुनिया में है, स्वरूप सम्बन्धी अंतर भले ही हो। जो शताब्दियों से भीतर घर कर गया है उसकी समाप्ति सरल मामला नहीं है। यह मानस, मानसिक संरचना का मामला है। हम सर्वज्ञानी नहीं हैं और जब तक कुछ भी अजाना, अबूझा, रहस्यमय और अव्याख्यित है, जब तक असुरक्षा है, तद्जनित भय है, किसी न किसी तरह का अन्धविश्वास भी होगा। शिक्षा मात्रा और तीक्ष्णता को घटा जरूर सकती है, अन्धविश्वास को कम कर सकती है।

(एक निवेदन, सूचना भी है कि उक्त उद्धरणों में वाक्य-विन्यास, हिज्जों और मात्राओं आदि सम्बन्धी गलतियों को सुधारा नहीं गया है ताकि हम जान सकें कि हम अपने बच्चों को अपनी हिन्दी तक ठीक से नहीं पढ़ा पाये हैं।)
चलो इतना तो है
कि बच्चों के बहाने
हारे हुए इतिहास
और अनदेखे कल के बीच
सपने के पुल बाँधने की
हिम्मत मिलती रहती है
कभी कभी
-अशोक पांडे

 

इस प्रतियोगिता के आयोजक नैनीताल बैंक
26वीं नैनीताल समाचार निबन्ध प्रतियोगिता इस बार 12 अगस्त को आदर्श राजकीय बालिका इण्टर काॅलेज, नैनीताल में सम्पन्न हुई। इस साल के मानसून की सबसे मूसलाधार वर्षा के बीच भी लगभग 40 स्कूलों के 380 विद्यार्थियों ने प्रतियोगिता में भाग लिया, जिनमें भवाली, भीमताल, ज्योलीकोट और पटवाँगर आदि स्थानों के विद्यार्थी भी थे। तत्काल दिये जाने वाले विषयों में कनिष्ठ वर्ग (कक्षा 4, 5 व 6) के लिये विषय था: ‘मुझे खेलना पसन्द है’; मध्यम वर्ग (कक्षा 7, 8 व 9) के लिये विषय था: ‘क्या टयूशन जरूरी है’ और वरिष्ठ वर्ग (कक्षा 10, 11 व 12) को ‘शिक्षा हमें अंधविश्वास से मुक्त करती है’ विषय पर लिखने को कहा गया था। सर्वश्री दीप चन्द्र पंत, सोबन सिंह, त्रिलोचन जोशी, जगमोहन रौतेला, राजकुमार भट्ट और दिवा पाठक इस वर्ष के निर्णायक थे।  
प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण समारोह भी आदर्श राजकीय बालिका इण्टर काॅलेज में 3 सितम्बर 2018 को सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नगर के वरिष्ठ नागरिक राजेन्द्र लाल साह थे। अध्यक्षता सुप्रसिद्ध रंगकर्मी जहूर आलम ने की। 41 सफल बच्चों को इस अवसर पर पुरस्कृत किया गया। माउण्ट एलबर्न स्कूल भीमताल को समूह रूप में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिये चल वैजयन्ती प्रदान की गई। इस वर्ष के आयोजन का सबसे सुखद पक्ष श्री ऐपाल देवता राजकीय इंटर कालेज, पटवाडाँगर की दो छात्राओं, प्रियंका कनवाल तथा गोपिका बिष्ट द्वारा किया सराहनीय मंच संचालन रहा।
समीक्षक प्रेम बल्लभ पांडे ‘रमदा’ की संस्तुति पर इस वर्ष पहली बार लौंगव्यू पब्लिक स्कूल के अक्षत बिष्ट का चयन गया, जिन्हें 27 अक्टूबर को उनके विद्यालय की एसेंबली में जाकर सम्मानित किया गया।

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